छत्तीसगढ़जांजगीर-चांपा

पंतोरा में धूल पंचमी पर खेली जाती है अनोखी लट्ठमार होली, कुंवारी कन्याएं बरसाती हैं अभिमंत्रित बांस की छड़ियां

रिपोर्टर: दीपक यादव
लोकेशन: जांजगीर-चांपा

जांजगीर-चांपा जिले के पंतोरा गांव में होली के पांच दिन बाद धूल पंचमी के दिन अनोखी परंपरा के साथ लट्ठमार होली मनाई जाती है। यहां कुंवारी कन्याएं अभिमंत्रित बांस की छड़ियों से ग्रामीणों को प्रतीकात्मक रूप से मारती हैं। ग्रामीणों की मान्यता है कि इस छड़ी का स्पर्श होने से बीमारियां दूर रहती हैं और गांव में सुख-समृद्धि बनी रहती है। बरसाने की तर्ज पर खेली जाने वाली यह परंपरा सैकड़ों सालों से चली आ रही है और आज भी पूरे उत्साह और आस्था के साथ निभाई जाती है।

जांजगीर-चांपा जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर कोरबा रोड पर स्थित पंतोरा गांव अपनी अनोखी लट्ठमार होली के लिए जाना जाता है। जहां पूरे देश में होली 4 मार्च को मनाई गई, वहीं पंतोरा में होली के पांचवें दिन धूल पंचमी के अवसर पर लट्ठमार होली का आयोजन किया जाता है। स्थानीय भाषा में इसे डंगाही होली भी कहा जाता है।
बलौदा ब्लॉक के इस गांव में स्थित मां भवानी मंदिर परिसर में हर साल रंग पंचमी के दिन बड़ी संख्या में ग्रामीण एकत्र होते हैं। यहां एक दिन पहले ग्रामीण कोरबा जिले के मड़वारानी जंगल से विशेष बांस की छड़ियां लेकर आते हैं। मान्यता है कि जिस बांस को एक ही कुल्हाड़ी के वार में काटा जाए, उसी बांस की छड़ी को पूजा के लिए उपयोग किया जाता है।
रंग पंचमी के दिन मां भवानी मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद कुंवारी कन्याएं बांस की छड़ी को माता के चरणों से पांच बार स्पर्श कराती हैं और फिर मंदिर परिसर में मौजूद देवी-देवताओं को भी छड़ी से स्पर्श कराया जाता है।


इसके बाद बैगा (पंडित) द्वारा वही छड़ियां कुंवारी कन्याओं को दी जाती हैं, जिनसे वे मंदिर परिसर और गांव में मौजूद लोगों पर प्रतीकात्मक रूप से छड़ियां बरसाती हैं। ग्रामीणों का विश्वास है कि इस छड़ी का स्पर्श होने से बीमारियां दूर रहती हैं और गांव में किसी प्रकार की महामारी नहीं फैलती।
ग्रामीण लाल बहादुर सिंह के अनुसार यह परंपरा कई सौ सालों से चली आ रही है और गांव की पहचान बन चुकी है। वहीं गांव की कन्या खुशबू ने बताया कि मंदिर से निकलने के बाद कन्याएं रास्ते में खड़े लोगों और राहगीरों को भी छड़ी से मारती हैं, लेकिन कोई भी इसका विरोध नहीं करता बल्कि लोग इसे आस्था से जोड़कर स्वीकार करते हैं।


इस दौरान गांव में रंग-गुलाल भी खेला जाता है और पूरा माहौल उत्सव में बदल जाता है। ग्रामीणों का मानना है कि जब से यह परंपरा शुरू हुई है तब से गांव में कोई बड़ी बीमारी नहीं फैली है, इसलिए वे आज भी इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं।

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