अमेरिका की AI ताकत चीनी वैज्ञानिकों के भरोसे! मेटा की सुपर लैब में 11 में से 7 रिसर्चर चीन से, 1 भी अमेरिकी नहीं

वॉशिंगटन डीसी
मेटा की नई सुपर इंटेलिजेंस लैब को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। कंपनी के अंदर चल रहे इस टॉप-सीक्रेट प्रोजेक्ट में काम कर रहे 11 में से 7 वैज्ञानिक चीन से हैं, जबकि एक भी शोधकर्ता अमेरिकी नहीं है। बाकि 4 भारत, ब्रिटेन, साउथ अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया से हैं।
यह वही प्रोजेक्ट है जिसके लिए मार्क जकरबर्ग ने अपने टॉप AI चीफ को जोड़ने में 1.26 लाख करोड़ रुपए खर्च किए थे।
चीन वर्सेज अमेरिका—लेकिन रिसर्च में साथ-साथ
अमेरिका लंबे समय से चीन को AI में सबसे बड़ा खतरा बताता है। इसके बावजूद सच्चाई यह है कि:
अमेरिका में हो रहा टॉप AI रिसर्च
चीनी वैज्ञानिकों के दम पर आगे बढ़ रहा है
मेटा की AI टीमों में मंदारिन सीखना तक मजाक में “ज़रूरी” कहा जाता है
कंपनी के 6,300 H-1B वीजा में बड़ी हिस्सेदारी चीनी टैलेंट की
ऐप्पल, गूगल, इंटेल, सेल्सफोर्स और माइक्रोसॉफ्ट भी चीनी संस्थानों के साथ मिलकर बड़े रिसर्च कर चुके हैं।
माइक्रोसॉफ्ट ने तो 92 बड़े AI पेपर चीन के साथ मिलकर पब्लिश किए।
टॉप AI रिसर्चर्स में एक-तिहाई चीन से
2020 की एक स्टडी के मुताबिक दुनिया के टॉप AI वैज्ञानिकों में लगभग 1/3 चीन से आते हैं, और इनमें से ज्यादातर अमेरिका की यूनिवर्सिटीज व कंपनियों में काम कर रहे हैं।
2019 में अमेरिका में काम कर रहे 100 चीनी टॉप-रिसर्चर्स में से 87 आज भी वहीं हैं—यानी ChatGPT आने से पहले से लेकर आज तक।
अमेरिका की AI इंडस्ट्री को सबसे बड़ा फायदा चीनी टैलेंट से
विशेषज्ञों के मुताबिक:
चीनी छात्र अमेरिका पढ़ने आते हैं
सिलिकॉन वैली में ही जम जाते हैं
और अमेरिकी AI को दुनिया में सबसे आगे बनाए रखते हैं
अगर इमिग्रेशन पॉलिसी और सख्त हुई, तो नुकसान अमेरिका की कंपनियों को ही होगा।
टेक चोरी का खतरा भी, लेकिन फायदा ज्यादा
कुछ मामलों ने डर बढ़ाया है—जैसे 2023 में एक हैकर ने ओपनAI के इंटरनल सिस्टम से डेटा चुरा लिया था।
इसके बावजूद एक्सपर्ट्स का मानना है कि:
चीनी वैज्ञानिकों के बिना सिलिकॉन वैली AI रेस में पिछड़ जाएगी
रिसर्च सहयोग अमेरिका को अभी भी सबसे बड़ा लाभ देता है




