मछुआरों की रोज़ी पर हमला! तालाब तोड़कर लाखों का नुकसान, FIR नहीं—जांजगीर-चांपा में कानून मौन?

REPORTER मुरली नायर
LOCATION जांजगीर-चांपा
जांजगीर-चांपा जिले से कानून व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती एक बेहद गंभीर और संवेदनशील खबर सामने आई है।
यह मामला नवागढ़ विकासखंड के ग्राम अवरीद का है, जहां एक पंजीकृत मछुआरा समिति के अध्यक्ष ने गांव के ही कुछ लोगों पर तालाब तोड़कर लाखों की मछलियों को नुकसान पहुंचाने और जान से मारने की धमकी देने जैसे संगीन आरोप लगाए हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पीड़ित पक्ष द्वारा थाना नवागढ़ में शिकायत देने के बावजूद अब तक एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। पीड़ित परिवार का आरोप है कि पुलिस की इस चुप्पी से आरोपियों के हौसले और बुलंद हो गए हैं, और वे खुलेआम धमकियां दे रहे हैं।

ग्राम अवरीद निवासी बीरीछ राम कश्यप, जो जय मां सरस्वती मछुवारा कल्याण समिति के अध्यक्ष हैं, उन्होंने आरोप लगाया है कि गांव के ही राकेश कुमार कश्यप, पिता दाऊराम कश्यप ने अपने साथियों—भागराम, भागीरथी और दाऊराम के साथ मिलकर रंजिशवश उस गदयाही तालाब को तोड़ दिया, जो शासन द्वारा समिति को 10 वर्षों के लिए पट्टे पर दिया गया था।
इस तालाब में मछली पालन किया जा रहा था, जिससे समिति के कई गरीब मछुआरा परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई थी। तालाब टूटने से पाली गई मछलियां बह गईं और समिति को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
पीड़ित पक्ष का कहना है कि जब उन्होंने इसका विरोध किया, तो आरोपियों ने खुलेआम गाली-गलौज की और जान से मारने की धमकी देते हुए कहा—
“जो उखाड़ सकते हो उखाड़ लो, हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”
सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतनी गंभीर घटना के बावजूद नवागढ़ थाने में अब तक मामला दर्ज क्यों नहीं किया गया?
क्या पुलिस की निष्क्रियता से आरोपियों को संरक्षण मिल रहा है?
क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतज़ार कर रहा है?
पीड़ित परिवार का आरोप है कि वे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित हैं और लगातार मिल रही धमकियों के कारण भय के साए में जीने को मजबूर हैं।

अब हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि पीड़ित परिवार ने जांजगीर-चांपा पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर लिखित आवेदन सौंपते हुए चेतावनी दी है कि यदि इस बार भी न्याय नहीं मिला, तो वे एसपी कार्यालय के सामने आत्मदाह करने को मजबूर होंगे।
यह मामला सिर्फ एक तालाब या एक समिति का नहीं है…
यह सवाल है गरीब मछुआरों की रोज़ी-रोटी का…
यह सवाल है पुलिस की जवाबदेही का…
और यह सवाल है कि क्या न्याय पाने के लिए आम आदमी को अपनी जान दांव पर लगानी पड़ेगी?
अब निगाहें जिला प्रशासन और पुलिस विभाग पर टिकी हैं—
कि इस गंभीर मामले में कब और क्या कार्रवाई होती है।




