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बांग्लादेश की राजनीति में भूचाल: शेख हसीना को मानवता के अपराधों के दोषी कर फांसी की सजा

बांग्लादेश की अंतर्राष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल (ICT-BD) ने अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए मृत्युदंड सुनाया है। यह ऐतिहासिक कदम दक्षिण एशिया की राजनीति में एक गहरे संकट की दहलीज़ पर खड़ा कर रहा है। ट्रिब्यूनल का यह फैसला उनकी अनुपस्थितिमा (in absentia) हुआ है, क्योंकि हसीना फिलहाल भारत में हैं। इससे न केवल बांग्लादेश के अंदरूनी उतार-चढ़ाव की एक नई कड़ी खुली है, बल्कि इसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हलचल मचा दी है।

अभियोग और फैसला: अदालत का निष्कर्ष

ट्रिब्यूनल ने हसीना पर लगाए गए आरोपों की लंबी सुनवाई के बाद निष्कर्ष निकाला है कि उन्होंने 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले विद्रोह के दौरान मानवाधिकारों का उल्लंघन करने का आदेश दिया था। अदालत के दस्तावेज़ों (फैसले की प्रति लगभग 453 पेज) में कहा गया है कि हसीना सरकार ने लाठीचार्ज, गोलीबारी और हिंसा के जरिए विरोध को कुचला था, जिससे लगभग 1,400 लोगों की जानें गई थीं।

अदालत का यह भी कहना था कि यह “संगठित और सिस्टमेटिक” कार्रवाई थी, न कि सिर्फ़ अनुशासनहीनता। ऐसे अपराधों को “मानवता के खिलाफ अपराध” की श्रेणी में रखा गया है, जिसके लिए ट्रिब्यूनल ने सबसे सख्त सजा — मृत्युदंड — तय की है।

हसीना की प्रतिक्रिया: “राजनीति-प्रेरित न्याय”

फैसले के बाद हसीना ने इसे राजनीति की साजिश करार दिया है। उन्होंने कहा है कि ट्रिब्यूनल पक्षपातपूर्ण है और उन्हें अपना पक्ष अदालत में पूरी तरह व्यक्त करने का मौका नहीं मिला। उनके समर्थक, अवामी लीग, ने इस फैसले को “लोकतंत्र की हत्या” चेतावनी के रूप में पेश किया है।

हसीना ने कहा है कि यह फैसला केवल व्यक्तिगत प्रतिशोध नहीं है, बल्कि उन राजनीतिक गुटों द्वारा चलाया गया है, जो 1971 के मुक्ति संघर्ष के समय से ही उनके परिवार और विचारधारा के विरोधी रहे हैं।

बांग्लादेश में सुरक्षा और सामाजिक तनाव

फ़ैसले के कुछ ही घंटों के अंदर ही ढाका, चिटगाँग, राजशाही जैसे बड़े शहरों में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है। सरकारी भवनों के आसपास बैरिकेडिंग की गयी है, और कुछ इलाकों में धारा-144 लागू की गयी है, जिससे सार्वजनिक धरना-प्रदर्शन पर रोक लगाई जा सके।

समर्थक और विरोधी दोनों ही गुटों में प्रतिक्रियाओं की घोषणा की गई है — जहां हसीना समर्थकों ने फैसला ‘अन्याय’ बताया है, वहीं विरोधी गुट इसे ‘न्याय की ऐतिहासिक जीत’ के रूप में देख रहे हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि: 1971 का घाव अभी ताजा

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस सजा का मामला सिर्फ़ हाल के छात्र आंदोलन तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक राजनीतिक लड़ाई का हिस्सा है, जो 1971 की आज़ादी की जद्दोजहद और विभाजन के बाद की सत्ता संरचना तक जाती है। कुछ पूर्व राजनेता और गृहमंत्री इसे उस पुराने दर्द का प्रतिशोध मानते हैं — यानी, यह सजा केवल वर्तमान का मुद्दा नहीं, बल्कि इतिहास की गहरी चोटों का प्रतिबिंब है।

कानूनी जटिलताएं: अपील की चुनौतियाँ

ICT-BD के कानून के मुताबिक़, हसीना केवल तभी अपील दायर कर सकती हैं अगर वे ट्रिब्यूनल के सामने आत्मसमर्पण करें या हिरासत में आती हैं। फिलहाल उनकी भारत में मौजूदगी के मद्देनज़र, यह कठिन कानूनन और राजनैतिक सवाल खड़े करता है:

क्या बांग्लादेश सरकार हसीना की प्रत्यर्पणी की मांग करेगी?

अगर करें, तो भारत के साथ कैसी कूटनीतिक लड़ाई सामने आएगी?

हसीना का आत्मसमर्पण या गिरफ्तारी उनके समर्थकों के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और मानवीय प्रतिक्रियाएँ

कुछ अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों ने ट्रिब्यूनल की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं — वे कह रहे हैं कि यह मुकदमा राजनीतिक रंग लिए हुए था। दूसरी ओर, उन परिवारों के लिए, जिनके छात्र आंदोलन में मारे गए, यह फैसला न्याय की प्रतीक्षा का अंत हो सकता है।

विश्लेषकों का कहना है कि इस फैसले का दायरा सिर्फ बांग्लादेश ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की राजनीतिक स्थिरता और जनादेश पर गहरा असर देगा।

डॉ. इफ्तेखार करीम, ढाका विश्वविद्यालय के राजनीति और कानून विशेषज्ञ, बताते हैं“यह फैसला सिर्फ एक सज़ा नहीं है — यह बांग्लादेश की सत्ता संरचना, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और इतिहास के साथ हमारे संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करता है। हसीना की राजनीतिक विरासत और देश की भविष्य की दिशा अब दोनों ही एक नए मोड़ पर हैं।”

शेख हसीना को सुनाई गई फांसी की सजा ने बांग्लादेश में केवल एक राजनीतिक नेता को ही चुनौती नहीं दी है; यह पूरी राजनीतिक प्रणाली, न्यायपालिका और शक्ति संतुलन पर एक प्रश्नचिह्न है।
इस फैसले के बाद आने वाले हफ्तों और महीनों में

भारत-बांग्लादेश कूटनीति,

देश के भीतर राजनीतिक स्थिरता,

और न्याय की धारणा पर नए विमर्श उभर सकते हैं।

यह निश्चित है कि यह घटना दक्षिण एशिया के राजनीतिक परिदृश्य में लंबे समय तक गूंजती रहेगी।

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