राष्ट्रीय

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: राज्यपाल बिल ‘लटका’ नहीं सकते—मंजूर करें, लौटाएं या राष्ट्रपति को भेजें

नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को साफ कर दिया कि राज्यपाल विधानसभा से पास किसी भी बिल को अनिश्चितकाल तक रोककर नहीं रख सकते। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल के पास सिर्फ तीन विकल्प हैं—

  1. बिल को मंजूरी दें
  2. दोबारा विचार के लिए विधानसभा को लौटाएं
  3. राष्ट्रपति के पास भेजें

डेडलाइन नहीं तय होगी, लेकिन अगर राज्यपाल बेवजह देरी करेंगे तो सुप्रीम कोर्ट दखल देगा।

क्यों आया मामला सुप्रीम कोर्ट?

यह विवाद तमिलनाडु से शुरू हुआ था, जहां राज्यपाल ने कई बिल लंबे समय तक रोककर रखे थे। कोर्ट पहले ही कह चुका है—
राज्यपाल के पास कोई “वीटो पावर” नहीं होती।

अप्रैल 2025 के फैसले में Supreme Court ने यह भी कहा था कि राज्यपाल की ओर से भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को 3 महीने में फैसला लेना होगा।
राष्ट्रपति ने इसके बाद सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी और 14 सवाल भेजे—यही इस बड़ी सुनवाई का आधार बना।

5 जजों की संविधान पीठ ने दिया फैसला

सुनवाई चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अगुवाई में 5 जजों की बेंच ने की।
केंद्र का पक्ष अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल ने रखा, जबकि तमिलनाडु, बंगाल, केरल, कर्नाटक, पंजाब, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश ने केंद्र का विरोध किया।

सुनवाई के दौरान क्या–क्या हुआ? (संक्षेप में)

→ केंद्र: 1970 से अब तक सिर्फ 20 बिल ही लंबित रहे

कोर्ट ने कहा—सिर्फ आंकड़ों से निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। राज्यों के आंकड़े भी नजरअंदाज नहीं होंगे।

→ कर्नाटक: राज्यपाल और राष्ट्रपति “नाममात्र के प्रमुख”

कर्नाटक ने कहा—राज्यपाल की संतुष्टि का मतलब मंत्रिपरिषद की संतुष्टि है। फैसला रोकने का अधिकार नहीं।

→ बंगाल: बिल जनता की इच्छा, इसे राज्यपाल की मर्जी पर नहीं छोड़ा जा सकता

राज्यपाल को तुरंत फैसला लेना चाहिए, मंजूरी रोकने का अधिकार नहीं।

→ तमिलनाडु-बंगाल: राष्ट्रपति-राज्यपाल का कोई “व्यक्तिगत अधिकार” नहीं

वे सिर्फ मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करते हैं। बिल पर विचार करने का काम उनका नहीं।

→ केंद्र: राज्य सुप्रीम कोर्ट में रिट पिटीशन नहीं दे सकते

राज्यों के पास अनुच्छेद 32 का अधिकार नहीं।

→ BJP शासित राज्य: समय–सीमा तय करना कोर्ट का अधिकार नहीं

CJI ने पूछा—अगर कोई 5 साल तक बिल रोक दे, तो क्या कोर्ट चुप बैठा रहेगा?

→ केंद्र: विवाद बातचीत से सुलझें, हर चीज़ कोर्ट नहीं तय कर सकती

→ SC: राज्यपाल सरकार की मर्जी के मालिक नहीं

अगर विधानसभा बिल दोबारा भेज दे, तो राज्यपाल उसे राष्ट्रपति के पास नहीं भेज सकते।

फैसले का मतलब क्या है?
राज्यपाल अब बिलों को महीनों–सालों तक रोककर नहीं रख सकते
विधानसभा से पास बिलों की असली ताकत फिर से चुनी हुई सरकार के हाथ में

केंद्र–राज्य टकराव की स्थिति में SC दखल करने को तैयार

SC की दूसरी बड़ी टिप्पणी (संबंधित खबर)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा—
पड़ोसियों का झगड़ा आम बात है, इसे IPC 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) नहीं माना जा सकता।
कर्नाटक हाईकोर्ट द्वारा महिला को दी गई 3 साल की सजा रद्द कर दी गई।

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