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आम आदमी के लिए बजट या सिर्फ आंकड़ों का खेल

सभी वर्गों में हताशा – परमेश्वर पात्रे

रायपुर। छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 का अपना तीसरा बजट पेश करते हुए इसे “विकासोन्मुख” और “ऐतिहासिक” बताया है। लेकिन ज़मीनी हकीकत और बजट दस्तावेज़ों का सूक्ष्म अध्ययन कुछ और ही कहानी बयां करता है। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) की जिला उपाध्यक्ष बेमेतरा परमेश्वर पात्रे ने बजट पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि यह बजट आम आदमी की उम्मीदों पर खरा उतरता नहीं दिख रहा, बल्कि बड़े-बड़े आंकड़ों की चमक तक सीमित प्रतीत होता है।
बड़ा आकार, पर ज़मीन पर असर कहां?
सरकार ने इसे अब तक का सबसे बड़ा बजट बताया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बजट का आकार बढ़ाना ही विकास की गारंटी है? योजनाओं के क्रियान्वयन, पारदर्शिता और प्रत्यक्ष लाभ की स्पष्टता का अभाव दिखाई देता है। आम नागरिकों—विशेषकर बेरोजगार युवाओं, किसानों और मजदूर वर्ग—को ठोस राहत का इंतजार अब भी है।
बेरोजगार युवाओं के लिए ठोस रोडमैप नहीं
राज्य में बेरोजगारी लगातार एक गंभीर मुद्दा बनी हुई है। बजट भाषण में कौशल विकास और स्वरोजगार की बातें जरूर कही गईं, लेकिन बड़े पैमाने पर नई सरकारी भर्तियों या रोजगार सृजन की ठोस योजना का अभाव साफ नजर आता है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं को उम्मीद थी कि इस बार कोई निर्णायक घोषणा होगी, लेकिन उन्हें फिर निराशा हाथ लगी।
किसानों के लिए घोषणाएं ज्यादा, राहत कम
किसानों की आय दोगुनी करने का वादा वर्षों से दोहराया जा रहा है। इस बजट में कृषि के लिए प्रावधान तो किए गए हैं, परंतु लागत घटाने, समर्थन मूल्य में उल्लेखनीय बढ़ोतरी या कर्ज राहत जैसे सीधे लाभकारी कदमों पर स्पष्टता नहीं है। ग्रामीण इलाकों में यह भावना बन रही है कि घोषणाएं ज्यादा हैं, लेकिन जेब तक पहुंचने वाला लाभ सीमित है।
मजदूर और असंगठित वर्ग फिर हाशिए पर
महंगाई की मार झेल रहे मजदूर और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और न्यूनतम मजदूरी में ठोस सुधार की उम्मीद थी। लेकिन बजट में इस वर्ग के लिए कोई बड़ा या निर्णायक कदम नजर नहीं आता। दैनिक आय पर निर्भर वर्ग के लिए यह बजट राहत की बजाय औपचारिकता जैसा प्रतीत होता है।

कर्मचारियों की उम्मीदें भी अधूरी
राज्य के कर्मचारी वेतनमान, भत्तों और लंबित मांगों को लेकर आशान्वित थे। बजट में इन मुद्दों पर स्पष्ट निर्णय या घोषणा का अभाव कर्मचारियों में असंतोष को बढ़ा सकता है। प्रशासनिक वर्ग में भी निराशा की चर्चा है।
सवालों के घेरे में “विकास”
सरकार का दावा है कि यह बजट प्रदेश को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा। लेकिन आलोचकों का मानना है कि केवल आंकड़ों का विस्तार विकास का प्रमाण नहीं होता। असली कसौटी यह है कि संसाधनों का वितरण किस प्राथमिकता के आधार पर और किस वर्ग के हित में किया गया है।
अंत में परमेश्वर पात्रे ने इस बजट को “जुमलों से भरा बजट” करार देते हुए कहा कि बजट पेश होने के बाद राज्य के हर वर्ग में हताशा और निराशा का माहौल है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह बजट वास्तव में आम आदमी के जीवन में ठोस बदलाव लाएगा, या फिर यह सिर्फ कागज़ी आंकड़ों और घोषणाओं तक ही सीमित रह जाएगा

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