
लोकेशन:: बालोद
जिला ब्यूरो: के.पी. चंद्राकर
छत्तीसगढ़ में सरकार भले ही किसान हितैषी होने के दावे करे, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नज़र आ रही है।
बालोद जिले के सनौद धान खरीदी केंद्र को जिस तरह बिना लिखित आदेश, बिना पूर्व सूचना और बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के बंद किया गया, वह किसी सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित प्रयोग प्रतीत होता है — जिसमें किसान को मोहरा बना दिया गया है
धान खरीदी जैसे अत्यंत संवेदनशील और जीवन-यापन से जुड़े विषय पर मौखिक आदेश के आधार पर केंद्र बंद करना प्रशासनिक नियमों की खुली अवहेलना है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि —
क्या तहसीलदार को यह अधिकार है कि वह किसानों के भविष्य से जुड़ा फैसला बिना किसी लिखित आदेश के ले ले?
अगर नहीं, तो फिर यह आदेश आया कहां से और किसके दबाव में आया?
प्रशासन की ओर से रकबा समायोजन का तर्क दिया जा रहा है, लेकिन यही समायोजन अब किसानों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन चुका है।

कई किसानों के खातों में उनका धान कागज़ों में बिक चुका दिखाया गया, जबकि हकीकत में उन्होंने न तो धान बेचा और न ही उन्हें इसकी कोई जानकारी दी गई।
आज हालात यह हैं कि किसान सोसायटी पहुंच रहा है, लेकिन उसे यह कहकर लौटा दिया जा रहा है कि —
“आपका धान तो पहले ही बिक चुका है।”
यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि गंभीर वित्तीय अनियमितता और संभावित अपराध की ओर इशारा करती है।
क्योंकि धान खरीदी में कागज़ी हेराफेरी सीधे-सीधे किसानों के भुगतान, बोनस और समर्थन मूल्य को प्रभावित करती है।


खेती कोई खेल नहीं है।
किसान बीज से लेकर खाद, दवा, डीज़ल और मजदूरी तक कर्ज़ लेकर खेत में पसीना बहाता है।
और जब फसल बेचने का समय आता है, तो प्रशासनिक आदेशों की इस भूलभुलैया में फंसकर उसे खाली हाथ लौटना पड़ता है।




