छत्तीसगढ़ सरकार कराएगी रामलला के दर्शन, “पर कमीशन देना पड़ेगा”जांजगीर–चांपा में जिला पंचायत तक पहुंचे ‘रिश्वत राज’ के सबूत

जांजगीर–चांपा
रिपोर्ट – संजय शर्मा
छत्तीसगढ़ में चल रही रामलला दर्शन योजना अब गंभीर सवालों के घेरे में है। योजना का उद्देश्य आम श्रद्धालुओं को अयोध्या दर्शन कराना था, लेकिन ज़मीनी हकीकत बताती है कि इस योजना ने विभागीय कर्मचारियों के लिए ‘कमाई का नया रास्ता’ खोल दिया है।
इसका ताज़ा उदाहरण हाल ही में सामने आया, जब जिला पंचायत जांजगीर–चांपा की समाज कल्याण विभाग की सभापति उमा राठौर ने कलेक्टर जनदर्शन में लिखित शिकायत सौंपी। उनका पत्र इस बात का उदाहरण है कि योजना के नाम पर कैसे-कैसे तरीके से पैसे की वसूली की जा रही है।
क्या है आरोप? — रामलला दर्शन योजना में ‘कट’, ‘रिश्वत’ और वसूली का खेल
शिकायत के अनुसार योजना से जुड़े लाभार्थियों और फ़ाइलों में:
₹1000–1500 प्रति व्यक्ति ‘सेवा शुल्क’,
स्वीकृत ₹7000 में से ₹2000–3000 तक कटौती,
और फ़ाइल बढ़ाने के नाम पर सीधी रिश्वत
जैसे गंभीर आरोप सामने आए हैं।

यह मामला सिर्फ़ एक कर्मचारी का नहीं—
बल्कि यह संकेत देता है कि योजना के नाम पर जिले में एक संगठित ‘उगाही तंत्र’ सक्रिय है।सभापति का पत्र—भ्रष्टाचार की जमीनी हकीकत का ‘उदाहरण’
सभापति उमा राठौर का पत्र इस बड़े भ्रष्टाचार का एक प्रतिनिधि केस है।
उन्होंने लिखा कि:
कर्मचारी सामान्य योजनाओं को भी अपनी मेहरबानी बताकर पैसे मांगता है,
लाभार्थियों को ब्लैकमेल कर ‘बिना पैसा काम नहीं’ का माहौल बना दिया गया है,
और अब यह रवैया रामलला दर्शन योजना तक पहुँच गया है।
उनका बयान इस बात का संकेत है कि जिला स्तर पर भ्रष्टाचार की जड़ों ने योजना को खोखला कर दिया है।
भाजपा की ‘धार्मिक योजना’ भी नहीं बची?—नेताओं के भीतर ही नाराज़गी
राम मंदिर को लेकर अक्सर कहा जाता है कि इससे “अर्थव्यवस्था और रोजगार बढ़े।”
लेकिन यहाँ तो स्थिति उल्टी दिखाई देती है—
योजना के नाम पर रोजगार तो बना है,
पर वह आम लोगों के लिए नहीं,
बल्कि कुछ कर्मचारियों के लिए ‘पार्ट टाइम कमाई’ का नया साधन बन गया है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि
शिकायतकर्ता खुद भाजपा से जुड़े जिला पंचायत के पदाधिकारी हैं।
जब अपने ही शीर्ष प्रतिनिधि कर्मचारियों की रिश्वतखोरी से परेशान हों,
तो आम श्रद्धालुओं और गरीब लाभार्थियों की हालत का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं।
भ्रष्टाचार की छतरी इतनी मजबूत कि कार्रवाई भी ‘राम भरोसे’
मामला कलेक्टर तक पहुंच चुका है,
लेकिन प्रशासनिक प्रतिक्रिया अभी भी अस्पष्ट है।
जिले में चर्चा है—
योजना बदनाम हो रही है,
लोग लूटे जा रहे हैं,
और कर्मचारी ‘रामराज’ का मज़ा ले रहे हैं।




