
25 वर्षों का स्वर्णिम सफर
सम्पादकीय लेख -नर्मदा घोंसले
छत्तीसगढ़, भारत के मानचित्र पर उभरता हुआ वह राज्य, जिसने वर्ष 2000 में अपनी पहचान स्थापित की थी, आज अपने गठन के 25 गौरवशाली वर्षों का उत्सव मना रहा है। यह “छत्तीसगढ़ रजत महोत्सव 2025” केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि उस स्वर्णिम यात्रा का प्रतीक है जिसमें राज्य ने संघर्ष, श्रम, संस्कृति और संकल्प के सहारे नई ऊँचाइयाँ छुई हैं।
विकास की रजत रेखा: आत्मनिर्भरता से आत्मगौरव तक
वर्ष 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ ने जब स्वतंत्र अस्तित्व पाया, तब उसके सामने चुनौतियों का अंबार था—गरीबी, पिछड़ापन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी। लेकिन पिछले ढाई दशकों में यह राज्य न केवल इन चुनौतियों से उभरा बल्कि ‘नवा छत्तीसगढ़’ के निर्माण की दिशा में भी एक उदाहरण बना।
आज यह राज्य कृषि, ऊर्जा, खनिज, शिक्षा, स्वास्थ्य, सूचना प्रौद्योगिकी और पर्यटन के क्षेत्रों में देशभर में अपनी अलग पहचान बना चुका है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करने वाले योजनाओं ने गांवों में नई जान फूंक दी है।

प्राकृतिक संपदा और पर्यटन: धरती का हरा सोना
छत्तीसगढ़ का नाम आते ही मन में हरे-भरे जंगलों, कल-कल बहते झरनों और वन्यजीवों की छवि उभर आती है।
चित्रकूट जलप्रपात, जिसे ‘भारत का नियाग्रा’ कहा जाता है, अपने भव्य स्वरूप से हर पर्यटक को मोहित करता है।
तीरथगढ़ जलप्रपात, कोटमसर और कैलाश गुफाएं, और कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं।
धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भोरमदेव मंदिर—‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो’—राज्य की प्राचीन स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है।
इन स्थलों के विकास और संरक्षण ने राज्य को एक “पर्यटन गंतव्य राज्य” के रूप में राष्ट्रीय पहचान दिलाई है।
संस्कृति की धरोहर: लोक से लोक तक
छत्तीसगढ़ की आत्मा उसकी लोक संस्कृति और जनजातीय परंपराओं में बसती है। 35 से अधिक जनजातियों की विविध परंपराएँ—पंथी, करमा, सुआ, सरहुल और डंडा नृत्य—राज्य की सांस्कृतिक विविधता का जीवंत प्रदर्शन हैं।
राज्य का हस्तशिल्प, विशेष रूप से बेलमेटल कला (ढोकरा कला), टेराकोटा, बांस और लकड़ी का शिल्प, आज अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी पहचान बना चुका है।
यहां की संस्कृति में प्रकृति, श्रद्धा और श्रम का अद्भुत संगम झलकता है।
अर्थव्यवस्था और संसाधन: विकास की धुरी पर खनिज प्रदेश
छत्तीसगढ़ को “खनिजों का खजाना” कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
यहां कोयला, लौह अयस्क, डोलोमाइट, बाक्साइट जैसे खनिजों के विशाल भंडार हैं। इन्हीं के आधार पर राज्य ने खुद को देश के ऊर्जा और इस्पात केंद्र के रूप में स्थापित किया है।
राज्य की पहचान ‘धान का कटोरा’ होने की भी है—यहाँ के खेत सोने से नहीं, बल्कि धान की बालियों से लहलहाते हैं।
समाज और संवेदना: समावेशी शासन का प्रतीक
राज्य सरकार की नीतियाँ केवल विकास तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुँचाने का संकल्प लिए रहीं।
पशुपालन को आय का स्रोत बनाया।
महिला स्वसहायता समूहों ने आर्थिक आत्मनिर्भरता का नया युग रचा।
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निरंतर सुधार ने मानव विकास सूचकांक को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।
रजत महोत्सव का अर्थ: नवछत्तीसगढ़ का संकल्प
रजत महोत्सव केवल अतीत के गौरव का उत्सव नहीं, बल्कि भविष्य की योजनाओं का आरंभ है।
इस वर्ष राज्य सरकार ने इसे “विकास, संस्कृति और गौरव” की त्रयी के रूप में मनाने का निर्णय लिया है—जहाँ हर जिले में रजत रथ यात्रा, सांस्कृतिक उत्सव, युवा संकल्प सम्मेलन और नवाचार प्रदर्शनी के आयोजन होंगे।
छत्तीसगढ़—भारत का उज्ज्वल भविष्य
25 वर्षों की यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि एक राज्य केवल सीमाओं से नहीं, बल्कि अपने लोगों, संस्कृति और सपनों से बनता है।
छत्तीसगढ़ ने यह साबित किया है कि यदि इच्छाशक्ति और परिश्रम साथ हों तो विकास की राह कोई रोक नहीं सकता।
“रजत महोत्सव केवल बीते वर्षों की कहानी नहीं,
यह आने वाले स्वर्णिम भविष्य की प्रस्तावना है।”




