चीन ने प्रस्तावित किया WAICO: क्या ग्लोबल AI की नई पावर सेंटर बनने की तैयारी? भारत के सामने बड़ी कूटनीतिक चुनौती

APEC समिट में चीन ने एक बड़ा दांव खेलते हुए World Artificial Intelligence Cooperation Organization (WAICO) बनाने का प्रस्ताव रख दिया है, जिसका मुख्यालय शंघाई में तैयार होगा। यह सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि ऐसा कदम माना जा रहा है जिसके माध्यम से चीन वैश्विक AI नियम-कायदों को अपने अनुसार गढ़ना चाहता है।
ग्लोबल साउथ देशों को तकनीक-साझाकरण और फंडिंग का लालच जरूर दिया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह पहल कई सवाल भी खड़े करती है—
क्या WAICO, UN आधारित ग्लोबल AI प्रयासों का समर्थन करेगा या फिर एक समानांतर ‘चीनी मॉडल’ खड़ा करेगा?
और सबसे महत्त्वपूर्ण—भारत को किस रास्ते चलना चाहिए?
AI के लिए अभी दुनिया किन नियमों पर चल रही है?
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए अभी वैश्विक स्तर पर कोई एक統ीकृत कानून नहीं है। लेकिन कई ढांचे मौजूद हैं:
- अंतरराष्ट्रीय सुझाव और सॉफ्ट लॉ
UNESCO का AI एथिक्स फ्रेमवर्क (2021) और संयुक्त राष्ट्र महासभा का 2024 प्रस्ताव AI को सुरक्षित और मानव-केंद्रित रखने की कोशिश करते हैं।
लेकिन ये गैर-बाध्यकारी हैं—यानी इनका पालन कानूनी तौर पर अनिवार्य नहीं।
- यूरोपीय संघ का सख्त AI Act
दुनिया का पहला व्यापक और बाध्यकारी कानून—
जोखिम-आधारित श्रेणीकरण
2026 से पूर्ण लागू
‘अस्वीकार्य जोखिम’ वाले AI सिस्टम पर सीधा प्रतिबंध
यह मॉडल दुनिया में एक नया मानक स्थापित कर रहा है।
- AI ग्लोबल समिट्स: सुरक्षा सहयोग की शुरुआत
ब्रिटेन का बैलेचले पार्क डिक्लेरेशन (2023)
सियोल AI समिट (2024)
—इन सबका मकसद देशों और कंपनियों को AI जोखिमों पर एक साथ लाना है।
- G7 और BRICS की अपनी-अपनी दिशा
G7 लोकतांत्रिक मूल्यों आधारित AI चाहता है।
BRICS दक्षिण-दक्षिण सहयोग और वैकल्पिक ताकत बनाना चाहता है।
दुनिया दो ब्लॉक में बंटती नज़र आती है—यही आगे का बड़ा संकट है।
- कंपनियां भी नियम बना रही हैं
Meta, Google, OpenAI जैसी कंपनियां भी सुरक्षा कमिटमेंट और मानक लागू कर रही हैं, जिसका वैश्विक असर है।
एकीकृत वैश्विक AI नियम क्यों बन नहीं पा रहे?
मुख्य कारण ये हैं:
- अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता
दोनों की प्राथमिकताएँ अलग:
अमेरिका नवाचार और सुरक्षा
चीन राज्य-केंद्रित डिजिटल नियंत्रण
इससे AI मानदंडों पर सहमति मुश्किल हो जाती है।
- तकनीक की गति कानून से बहुत तेज़
एक कानून बनने में सालों लगते हैं, लेकिन AI हर 6-9 महीने में बदल जाता है।
- ग्लोबल साउथ को संसाधनों की कमी
AI अवसंरचना, कम्प्यूटिंग पावर और प्रतिभा ग्लोबल नॉर्थ में केंद्रित है।
- ‘फेयरनेस’ और ‘बायस’ की सार्वभौमिक परिभाषा ही तय नहीं
क्योंकि सामाजिक ढांचे हर देश में अलग।
- सीमा-पार डेटा कानूनों का टकराव
GDPR, अमेरिकी नियम और चीन का डेटा नियंत्रण—सबकी प्राथमिकताएँ अलग।
- AI की ब्लैक बॉक्स समस्या
कई उन्नत मॉडलों के काम करने का तरीका उपयोगकर्ता तो दूर, विशेषज्ञ भी नहीं समझ पाते।
भारत इस मौके का फायदा कैसे उठा सकता है?
भारत AI को कूटनीति और वैश्विक नेतृत्व का नया हथियार बना सकता है।
- ग्लोबल साउथ का नेता बनने का मौका
इंडिया-AI मिशन (₹10,371 करोड़) और फ्रांस के साथ AI Summit की सह-अध्यक्षता भारत को एक बड़ा मंच देती है।
- Indian DPI (UPI, Aadhaar, DigiLocker) दुनिया को मॉडल दे सकता है
भारत का डिजिटल ढांचा कम-खर्च और उच्च-प्रभाव का उदाहरण है, जिसे AI और मजबूत बना सकता है।
- AI के जरिए तेज़ और सटीक कूटनीति
डेटा-आधारित कूटनीतिक फैसले
संकटों का पूर्वानुमान
कांसुलर सेवाओं में स्वचालन
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की स्थिति मजबूत
AI आधारित ट्रेड-एनालिटिक्स भारत को आर्थिक कूटनीति में बढ़त दिला सकते हैं।
- साइबर सुरक्षा में रणनीतिक ताकत
AI आधारित रक्षा और साइबर सुरक्षा तकनीक भारत को एक सुरक्षित तकनीकी साझेदार बनाती है।
आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?
- एक ‘Multicentric AI Governance Commons’ बनना चाहिए
एक ऐसा तंत्र जिसमें अलग-अलग देश अपनी संप्रभुता बनाए रखते हुए अंतरराष्ट्रीय सहयोग कर सकें।
- AI Regulatory Sandboxes
ऐसे सैंडबॉक्स जहां जोखिम के अनुसार कानून अपने-आप कठोर या लचीले होते जाएँ।
- ग्लोबल साउथ के लिए AI क्षमता केंद्र
जिससे गरीब देशों को विकसित देशों पर निर्भर न रहना पड़े।
- AI-जनित सामग्री की अनिवार्य डिजिटल लेबलिंग
डीपफेक और AI कंटेंट की पहचान स्पष्ट करना ज़रूरी।
- AI के लिए वैश्विक मॉडल कार्ड और ऑडिट API
ताकि हर देश मॉडल पारदर्शिता की जाँच कर सके।




