माओवाद की धरती पर विकास की दस्तक” — जनवरी 2026 तक ‘माओवाद-मुक्त छत्तीसगढ़’ का संकल्प

छत्तीसगढ़
जो कभी नक्सलवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में गिना जाता था, अब एक नई दिशा में बढ़ रहा है। राज्य सरकार ने ऐलान किया है कि जनवरी 2026 तक छत्तीसगढ़ को पूरी तरह माओवादी गतिविधियों से मुक्त कर दिया जाएगा। यह कदम न केवल सुरक्षा के मोर्चे पर सफलता का प्रतीक है, बल्कि राज्य के विकास और शांति के नए अध्याय की शुरुआत भी है।
छत्तीसगढ़ सरकार ने माओवाद पर निर्णायक बढ़त हासिल करने का दावा किया है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा है कि राज्य को जनवरी 2026 तक “माओवाद-मुक्त” बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत सरकार न केवल सुरक्षा अभियानों को तेज कर रही है, बल्कि उन क्षेत्रों में विकास और विश्वास की नीति को भी प्राथमिकता दी जा रही है, जहां दशकों से माओवाद ने जड़ें जमा रखी थीं।
मुख्यमंत्री ने कहा —
“छत्तीसगढ़ में अब बंदूक की आवाज नहीं, विकास की गूंज सुनाई देगी। हमारा उद्देश्य है कि हर गांव, हर घर तक विकास पहुंचे और युवा बंदूक नहीं, कलम और कुदाल उठाएं।”
यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब हाल के वर्षों में माओवादी गतिविधियों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।
सुरक्षा बलों की रणनीति, खुफिया नेटवर्क की मजबूती और ग्रामीण इलाकों में जनसंपर्क अभियानों ने अब तक राज्य को काफी राहत दी है।
राज्य सरकार ने हाल ही में आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और पुनर्वास के अवसर देकर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास भी तेज किया है।
बीजापुर, सुकमा, दंतेवाड़ा और नारायणपुर जैसे जिलों में युवाओं को स्वरोजगार और पर्यटन आधारित योजनाओं से जोड़ा जा रहा है।
विकास के नए मॉडल
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और इंटरनेट कनेक्टिविटी की योजनाओं पर तेजी से काम जारी है।
बस्तर फाइटर्स, पुलिस बल की नई इकाई, ने माओवादी इलाकों में स्थायी सुरक्षा उपस्थिति बनाई है।
हाल ही में 30 पूर्व नक्सलियों को हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में ट्रेनिंग दी गई, ताकि वे समाज में आत्मनिर्भर बन सकें।
इन प्रयासों से यह साफ है कि सरकार न केवल बंदूक के दम पर, बल्कि विकास और अवसर के ज़रिए माओवाद की विचारधारा को खत्म करना चाहती है।
जनता की उम्मीदें
स्थानीय लोगों का कहना है कि सड़कों और रोजगार के अवसर बढ़ने से नक्सलवाद का प्रभाव तेजी से घटा है।
“पहले गांव में हर वक्त डर का माहौल रहता था, अब बच्चे स्कूल जा रहे हैं और बाजार में रौनक लौट आई है।” — ग्रामीण, बस्तर क्षेत्र
राज्य सरकार की यह घोषणा राजनीतिक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह लक्ष्य तय समय में पूरा हो गया, तो छत्तीसगढ़ देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल होगा जिसने सशस्त्र आंदोलन को विकास के ज़रिए खत्म किया।
जनवरी 2026 तक “माओवाद-मुक्त छत्तीसगढ़” का लक्ष्य न केवल एक प्रशासनिक घोषणा है, बल्कि राज्य के इतिहास में स्थायी शांति और विकास की ओर बढ़ता कदम भी है। अब देखना यह होगा कि क्या यह संकल्प ज़मीन पर पूरी तरह उतर पाता है या नहीं — लेकिन इतना तय है कि छत्तीसगढ़ अब बंदूक नहीं, बदलाव की भाषा बोलना चाहता है।




