छत्तीसगढ़ में सुआ नृत्य की गूंज—पेंड्री की बच्चियों ने जीवंत रखी लोकसंस्कृति की परंपरा”

REPORTER:जय ठाकुर
LOCATION:जांजगीर, छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति का प्रतीक सुआ नृत्य इस समय पूरे प्रदेश में परंपरा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। पौष माह के पूर्णिमा यानी छेरछेरा तक चलने वाला यह लोकनृत्य, आज भी ग्रामीण परिवेश में अपनी पहचान और गरिमा बनाए हुए है।इस नृत्य में महिलाएं धान की टोकरी में रखे मिट्टी के तोते सुआ के चारों ओर गोलाकार घेरा बनाती हैं… ताल के साथ ताली बजाते हुए प्रेम, विरह और प्रकृति के गीत गाती हैं।


यह सिर्फ नृत्य नहीं… बल्कि छत्तीसगढ़ की भावनाओं, लोकगाथाओं और ग्रामीण जीवन की धड़कन है।हालांकि आधुनिकता के इस दौर में कई लोककलाएं कमजोर पड़ रही हैं, लेकिन गांवों में आज भी इस धरोहर की झलक बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देती है। जांजगीर के पेंड्री गांव की कुछ बच्चियां पौष पूर्णिमा के पहले ही सुआ नृत्य करते मिलीं… न केवल उन्होंने इस परंपरा का प्रदर्शन किया… बल्कि इससे जुड़े लोकविश्वास और सांस्कृतिक महत्व की जानकारी भी साझा की।(बाइट – तुलसी)(बाइट के बाद)छत्तीसगढ़ की पहचान बने ऐसे लोकनृत्य, आने वाली पीढ़ियों के लिए सिर्फ कला नहीं बल्कि संस्कार और संस्कृति के पाठ हैं… और इन बच्चियों ने आज यह साबित कर दिया कि जब तक ये परंपराएं जीवित हैं… तब तक हमारी जड़ें भी सुरक्षित हैं।




