जनजातीय गौरव दिवस में भावनात्मक पल — राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मिले ‘राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र’ बसंत पण्डो, पण्डो समुदाय को मिला सम्मान का नया संदेश

अंबिकापुर में आयोजित जनजातीय गौरव दिवस कार्यक्रम में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक क्षण देखने को मिला, जब राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु की विशेष मुलाकात बसंत पण्डो से हुई। बसंत पण्डो वही व्यक्ति हैं जिन्हें देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वर्ष 1952 में अपने हाथों से गोद में उठाया था और स्नेहपूर्वक “गोलू” नाम दिया था। इसी घटना के बाद पण्डो जनजाति को “राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र” के रूप में पहचाना जाने लगा।
मंच पर बसंत पण्डो से मिलते हुए राष्ट्रपति मुर्मु ने अत्यंत आत्मीयता दिखाई। उन्होंने उनसे हालचाल पूछा, उन्हें स्नेहपूर्वक शॉल ओढ़ाई और कहा— “आप मेरे भी पुत्र हैं।”
यह वाक्य न सिर्फ बसंत पण्डो के लिए सम्मान का क्षण था, बल्कि पूरे पण्डो समुदाय के लिए गौरव का विषय बन गया।

पण्डोनगर का अनोखा इतिहास — जहां जनजाति को मिला ‘राष्ट्रपति का आशीर्वाद’
सूरजपुर जिले से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित पण्डोनगर सिर्फ एक गाँव नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक पहचान है। यहां 95% से अधिक आबादी पण्डो जनजाति की रहती है। यही वह स्थान है जहाँ 1952 में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के आगमन पर पण्डो समाज ने जंगल काटकर उनके लिए एक झोपड़ी बनाई थी।
उसी झोपड़ी में वे रुके — और इसी झोपड़ी को आज “देश का दूसरा राष्ट्रपति भवन” कहा जाता है।
इस ऐतिहासिक प्रवास ने पण्डो समुदाय को अद्भुत पहचान दी, लेकिन इसके बावजूद आज भी उन्हें केंद्र सरकार से विशेष पिछड़ी जनजाति (PVTG) का दर्जा प्राप्त नहीं हो सका है। राज्य सरकार यह मान्यता दे चुकी है, लेकिन केंद्र स्तर पर यह मांग अब भी अधूरी है।
बसंत पण्डो की इच्छा — राष्ट्रपति से सीधे रखेंगे समुदाय की सबसे बड़ी मांग
राष्ट्रपति मुर्मु के सरगुजा आगमन को लेकर पण्डोनगर में उत्साह चरम पर है। समुदाय के बुजुर्ग बसंत पण्डो वर्षों से एक ही बात कह रहे हैं—
“हम राष्ट्रपति से मिलकर अपनी काबिज भूमि का स्थायी पट्टा चाहते हैं।”
उनकी मांग है कि जिस जमीन पर पण्डो समाज पीढ़ियों से रहता आया है, उसे स्थायी पट्टा दिया जाए ताकि भविष्य में किसी भी तरह की बेदखली का डर हमेशा के लिए खत्म हो जाए।
पण्डो समाज की मुख्य चिंताएं और उम्मीदें
पीढ़ियों से काबिज भूमि का स्थायी पट्टा
केंद्र सरकार से PVTG मान्यता
पारंपरिक आवास और सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा
शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार में विशेष योजनाओं की जरूरत
राष्ट्रपति मुर्मु द्वारा बसंत पण्डो को दिए गए स्नेहपूर्ण संदेश ने इस समुदाय की उम्मीदें और मजबूत कर दी हैं। यह मुलाकात पण्डो जनजाति के लिए सिर्फ सम्मान नहीं—बल्कि भविष्य में सकारात्मक बदलाव का संकेत मानी जा रही है।




