अर्थशास्त्र

भारत में पारिवारिक ऋण और परिसंपत्ति निर्माण: उत्साह या चेतावनी?

नई दिल्ली

Reserve Bank of India (आरबीआई) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, भारत के परिवार अब परिसंपत्तियाँ बनाने से कहीं जल्दी ऋण ले रहे हैं — यह प्रवृत्ति वित्तीय व्यवहार में बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है।

क्या बताती है स्थिति?
वर्ष 2019-20 से 2024-25 के बीच, पारिवारिक वित्तीय देनदारियाँ लगभग 102% बढ़ीं, जबकि वित्तीय परिसंपत्तियों में केवल 48% की वृद्धि हुई है।
जीडीपी के अनुपात में देखा जाए, तो वित्तीय परिसंपत्तियों का क्रमिक हिस्सा 12% से घटकर 10.8% हो गया है। वहीं, देनदारियों का अनुपात 3.9% से बढ़कर 4.7% हो गया है।
म्यूचुअल फंड के माध्यम से निवेश की प्रवृत्ति तेज हुई है — 2019-20 में यह लगभग 2.6% था, जो 2024-25 में 13.1% के करीब पहुँच गया।

इसके क्या अर्थ हैं?
उपभोग-उधारी का बढ़ना: जब परिवार ज्यादा ऋण ले रहे हैं और परिसंपत्ति कम बना रहे हैं, तो यह संकेत देता है कि ऋण का उपयोग उपभोग के लिए हो रहा है, न कि दीर्घकालीन संपत्ति निर्माण के लिए।

बैलेंस शीट कमजोर होना: स्थायी वित्तीय परिसंपत्तियों की कमी और बढ़ती देनदारियाँ, पारिवारिक वित्तीय सुरक्षा को जोखिम में डाल सकती हैं।
मैक्रो-वित्तीय जोखिम: व्यक्तिगत स्तर पर बढ़ता कर्ज समग्र अर्थव्यवस्था के लिए भी निष्क्रिय नहीं है — यदि कई परिवार ऋण चुकाने में अक्षम हो जाएँ, तो बैंकिंग व वित्तीय क्षेत्र पर दबाव बन सकता है।

क्या चुनौतियाँ सामने हैं?

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की आय अक्सर अस्थिर होती है, जिससे बचत का स्वरूप कमजोर पड़ता है।

उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन-यापन की लागत में वृद्धि ने निवेश हेतु उपलब्ध राशि कम कर दी है।

वित्तीय साक्षरता का स्तर अभी भी औसत से कम है — परिणामस्वरूप जोखिमपूर्ण निर्णय या उपभोग-उधारी को प्राथमिकता मिल रही है।

हालांकि भारत के कुल पारिवारिक ऋण-GDP अनुपात उभरते बाज़ार की तुलना में अभी कम है, लेकिन इसकी गति चिंता का विषय बनी हुई है।

आगे क्या किया जा सकता है?

वित्तीय साक्षरता कार्यक्रमों का विस्तार करना, ताकि आम परिवार उधारी व निवेश के बीच समझ बना सकें।

दीर्घकालीन बचत व निवेश उत्पादों जैसे ईएलएसएस (ELSS), स्वर्ण बॉण्ड आदि को बढ़ावा देना।

उपभोग-उधारी की जगह संपत्ति निर्माण-उधारी को प्रोत्साहित करना, उदाहरण के लिए: आवास, व्यवसाय स्थापित करने के लिए क्रेडिट।

आरबीआई व अन्य नियामकों द्वारा पारिवारिक ऋण-प्रवाहों की लगातार निगरानी और समय पर चेतावनी प्रणाली विकसित करना।

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों तथा ग्रामीण परिवारों की बचत क्षमता व निवेश विकल्पों को सुदृढ़ बनाना।

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