होली केवल रंगों का पर्व नहीं, समाज और मन की शल्य-चिकित्सा है – डॉ. शुभम गुप्ता

रिपोर्टर: ब्यूरो रिपोर्ट लोकेशन: छत्तीसगढ़
होली को आमतौर पर रंगों और उल्लास का त्योहार माना जाता है, लेकिन प्रख्यात सर्जन एवं समाज चिंतक डॉ. शुभम गुप्ता का मानना है कि होली का महत्व केवल उत्सव तक सीमित नहीं है। यह पर्व मनुष्य के भीतर और समाज में जमी नकारात्मकताओं को दूर करने की एक सामूहिक प्रक्रिया है—एक तरह की सामाजिक और मानसिक चिकित्सा।
डॉ. शुभम गुप्ता के अनुसार होलिका दहन बुराइयों के अंत का प्रतीक है। जैसे सर्जरी के दौरान शरीर से रोगग्रस्त ऊतकों को हटाया जाता है, वैसे ही होलिका दहन के माध्यम से अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष और कटुता जैसी मानसिक बीमारियों को जलाकर समाप्त करने का संदेश दिया जाता है। यह परंपरा समाज को आत्ममंथन और सुधार का अवसर देती है।

उन्होंने रंगों के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर भी प्रकाश डाला। रंग मनुष्य के मस्तिष्क और भावनाओं पर गहरा असर डालते हैं
लाल रंग ऊर्जा और उत्साह का प्रतीक है,
हरा रंग संतुलन और स्वास्थ्य को दर्शाता है,
पीला रंग आशा और सकारात्मकता का संकेत देता है।
जब लोग एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, हँसी-मज़ाक करते हैं और गले मिलते हैं, तो सामाजिक दूरियाँ स्वतः कम होती हैं। यह अपनापन मानसिक स्वास्थ्य के लिए औषधि जैसा कार्य करता है।
डॉ. गुप्ता ने कहा कि चिकित्सा केवल शरीर तक सीमित नहीं होती, बल्कि विश्वास और संबंधों की भी मरम्मत करती है। होली हमें पुराने गिले-शिकवे भुलाकर रिश्तों में नई शुरुआत करने की प्रेरणा देती है। आज के समय में, जब समाज विभिन्न विभाजनों और तनावों से जूझ रहा है, होली मानवता, समानता और भाईचारे का सशक्त संदेश देती है।
उन्होंने जिम्मेदार और सुरक्षित होली मनाने की अपील भी की। रासायनिक रंगों से परहेज, त्वचा और आँखों की सुरक्षा, नशे से दूरी और पर्यावरण के प्रति सजगता—ये सभी एक स्वस्थ उत्सव के आवश्यक अंग हैं। उनका कहना है कि स्वस्थ शरीर और प्रसन्न मन के साथ मनाई गई होली ही सच्चे अर्थों में पर्व कहलाती है।
डॉ. शुभम गुप्ता के अनुसार होली जीवन का प्रतीक है—जहाँ कितनी भी जटिल “सर्जरी” क्यों न करनी पड़े, लक्ष्य एक ही होता है: दर्द कम करना और मुस्कान लौटाना। इस होली पर केवल चेहरों को नहीं, दिलों को भी रंगने का संकल्प लें, द्वेष को जलाएँ और मानवता के रंग में रंग जाएँ।




