“रेत से सोना निकाल कर चलता है घर… नदी ही है रोज़गार!”

रिपोर्टर – सरोज रात्रै
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में एक ऐसा समुदाय है, जिसकी आजीविका का साधन न खेत हैं, न फैक्ट्री…
बल्कि नदी की रेत है।
यह लोग रोज़ बालू छानते हैं और उसमें से सोने के कण निकालकर अपने परिवार का पेट पालते हैं।
देखिए यह खास रिपोर्ट…
यह तस्वीरें छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के पत्थलगांव विकासखंड की हैं…
जहाँ बहनाटांगर क्षेत्र में मांड नदी के किनारे
सुबह से ही झोरा जाति के लोग जुट जाते हैं।
नदी के किनारे बैठकर ये लोग बालू को पानी में बार-बार छानते हैं…
कड़ी मेहनत के बाद रेत में छिपे
सोने के बारीक कण अलग किए जाते हैं।
यही सोने के कण इन परिवारों की रोज़ी-रोटी हैं।
दिनभर की मेहनत के बाद
करीब 500 से 800 रुपये मूल्य तक का सोना निकल पाता है,
जिसे स्थानीय दुकानों में बेचकर
घर का खर्च चलता है।
“नदी ही हमारा सहारा है।
जब तक नदी है, तब तक हमारा काम है।
हम लोग पीढ़ियों से बालू छानकर
सोना निकालते आ रहे हैं।
यही हमारे बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च है।”
झोरा समाज के लोगों का कहना है कि
उन्हें कोई दूसरा काम नहीं आता।
पूर्वजों से मिला यही पारंपरिक ज्ञान
आज भी उनकी पहचान बना हुआ है।
विशेष औजारों की मदद से
बालू को छाना जाता है।
स्थानीय बोली में इस प्रक्रिया को
‘झोरना’ कहा जाता है,
और इसी से इस समुदाय का नाम
‘झोरा’ पडा ।
नदी के मुहानों में सोना और हीरा पाए जाने की जानकारी
इन लोगों को पहले से थी।
इसी पारंपरिक समझ को
इन्होंने आजीविका में बदल दिया।
पीढ़ियों से चला आ रहा यह पारंपरिक व्यवसाय
आज भी झोरा जाति की पहचान है।
रेत में छिपा सोना
इनकी मेहनत और संघर्ष की कहानी कहता है।




