जापान में डिमेंशिया का बढ़ता संकट: 18,000 बुजुर्ग घर का रास्ता भूलकर भटके, सरकार अब AI और GPS तकनीक की मदद लेगी

टोक्यो
जापान में डिमेंशिया तेजी से राष्ट्रीय चिंता का विषय बनता जा रहा है। देश में 2024 के दौरान करीब 18,000 बुजुर्ग स्मृतिभ्रंश के कारण अपने घर से भटक गए, जिनमें से लगभग 500 बुजुर्गों की मौत लावारिस हालत में पाई गई। 2012 की तुलना में ऐसे मामलों में लगभग दोगुनी वृद्धि ने जापानी सरकार को गहरी चिंता में डाल दिया है। सरकार अब इस चुनौती से निपटने के लिए तकनीक-आधारित समाधान को प्राथमिकता दे रही है।
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डिमेंशिया: जापान की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती बनता रोग
जापानी स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, आने वाले वर्षों में डिमेंशिया से जुड़े मामलों में और तेज बढ़ोतरी की आशंका है। देश की बढ़ती बुजुर्ग आबादी के साथ यह समस्या और गंभीर रूप ले रही है।
मंत्रालय का अनुमान है कि 2030 तक डिमेंशिया से जुड़ी स्वास्थ्य व सामाजिक देखभाल की लागत 14 ट्रिलियन येन (करीब 90 अरब डॉलर) तक पहुंच सकती है, जबकि अभी यह खर्च लगभग 9 ट्रिलियन येन है।
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तकनीक बनेगी बड़ा सहारा: GPS से लेकर रोबोटिक केयर तक
जापानी सरकार ने डिमेंशिया मरीजों को सुरक्षित रखने और उनकी निगरानी को आसान बनाने के लिए तकनीकी समाधानों की ओर कदम बढ़ाए हैं। वर्तमान में कई क्षेत्रों में—
GPS ट्रैकिंग डिवाइस
AI आधारित पहचान तकनीक
रोबोटिक असिस्टेंट
स्मार्ट पहनने योग्य उपकरण (Wearables)
का प्रयोग बढ़ाया जा रहा है।
ये तकनीकें डिमेंशिया से पीड़ित लोगों के लोकेशन ट्रैक करने, पहचान की पुष्टि करने और भावनात्मक सहयोग देने में मदद कर रही हैं।
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विशेषज्ञों की राय: “टेक्नोलॉजी समाधान है, विकल्प नहीं”
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि तकनीक डिमेंशिया मरीजों के लिए एक बड़ी मदद साबित हो रही है, लेकिन यह मानवीय देखभाल का विकल्प नहीं बन सकती।
विशेषज्ञों का मानना है कि—
टेक्नोलॉजी केवल सुरक्षा, मॉनिटरिंग और पहचान में सहायता कर सकती है, जबकि भावनात्मक सहारा और दैनिक देखभाल इंसानी संपर्क से ही संभव है।
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सरकार का रुख: राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शामिल
जापानी सरकार ने डिमेंशिया को अपनी शीर्ष नीति प्राथमिकताओं में शामिल करते हुए—
नए सुरक्षा प्रोटोकॉल
कम्युनिटी सपोर्ट सिस्टम
तकनीक आधारित निगरानी मॉडल
लागू करने की प्रक्रिया तेज कर दी है।
देश के कई स्थानीय प्रशासन पहले ही AI और GPS ट्रैकिंग को लागू कर चुके हैं, जिससे हजारों बुजुर्गों को सुरक्षित वापस घर लाया जा चुका है।




