अर्थशास्त्र

भारत 2047 तक बनेगा जैव-प्रौद्योगिकी महाशक्ति?—तेजी से बढ़ती बायोइकोनॉमी, जीनोमिक क्रांति और BioE3 नीति खोल रही नई संभावनाएँ

भारत का जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र इस समय वैश्विक परिवर्तन के मोड़ पर खड़ा है। पिछले एक दशक में देश की जैव-अर्थव्यवस्था 10 अरब डॉलर से सीधे 165 अरब डॉलर तक पहुँच चुकी है, और 2047 तक इसे 1.2 ट्रिलियन डॉलर तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसे हासिल करने के लिए केवल वैज्ञानिक प्रगति ही नहीं, बल्कि चीन की तरह संरचनात्मक सुधार, निवेश आकर्षण और आधुनिक विनियामक ढाँचे की भी आवश्यकता है, जिसने पिछले दशक में 45 अरब डॉलर का बायोटेक निवेश खींचा और 200 से अधिक प्रतिस्पर्धी फर्में खड़ी कीं। भारत भी जीनोमिक्स, बायोफार्मा और बायो-मैन्युफैक्चरिंग में अपनी ताकत के सहारे वैश्विक बायोटेक नेतृत्व की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

भारत की जैव-अर्थव्यवस्था के तेजी से विस्तार की प्रमुख वजहों में जैव संसाधनों का उद्योगों में बढ़ता उपयोग, जीवाश्म ईंधन निर्भरता से दूरी और नीतिगत नवाचार शामिल हैं। 2030 तक बायोइकोनॉमी को 300 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। इस दिशा में सबसे बड़ा कदम कैबिनेट द्वारा स्वीकृत BioE3 नीति है, जिसने हाई-परफॉर्मेंस बायो-मैन्युफैक्चरिंग के लिए भारत को नए युग में प्रवेश कराया है। यह नीति स्मार्ट प्रोटीन, प्रिसीजन बायोमेडिसिन जैसे छह रणनीतिक क्षेत्रों पर फोकस करती है और 2070 नेट-जीरो लक्ष्य को समर्थन देने के लिए देशभर में बायो-एनेबलर और बायो-एआई हब स्थापित करने का रास्ता खोलती है।

जीनोमिक्स में भी भारत ने उल्लेखनीय छलांग लगाई है। जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद देश ने अपनी जीनोमिक सॉवरेनिटी स्थापित कर ली है। 10,000 भारतीयों के पूरे जीनोम अनुक्रमण ने वैश्विक मेडिकल डेटाबेस में मौजूद पश्चिमी पूर्वाग्रह को चुनौती देते हुए प्रिसीजन मेडिसिन के लिए भारत-विशेष डेटा उपलब्ध कराया है। यह उपलब्धि भविष्य में रोग-विशिष्ट उपचार, अनुवांशिक बीमारियों की पहचान और व्यक्तिगत चिकित्सा को बदल सकती है।

वैश्विक बायोफार्मा में भी भारत तेजी से नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है। सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया आज दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन उत्पादक है और भारत साइटिवा के ग्लोबल बायोफार्मा इंडेक्स 2025 में शीर्ष 10 देशों में शामिल हो गया है। बायोसिमिलर्स, इम्युनोथेरैपी और हाई-वैल्यू बायोलॉजिक्स में बढ़ती शोध क्षमता आयात निर्भरता को कम कर रही है।

ऊर्जा सुरक्षा में भी जैव-प्रौद्योगिकी बड़ा योगदान दे रही है। भारत ने 2030 का लक्ष्य 5 वर्ष पहले ही हासिल कर 2025 में 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) पूरा कर लिया। इससे 1.44 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बची और 244 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल का प्रतिस्थापन संभव हुआ। पराली और कृषि अवशेष का उपयोग किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण को भी सुरक्षित कर रहा है।

स्टार्टअप इकोसिस्टम में भी भारत की प्रगति प्रभावशाली है। 2014 में सिर्फ 50 बायोटेक स्टार्टअप थे, जबकि फरवरी 2025 तक यह संख्या बढ़कर 9,000 हो गई। BIRAC की लैब-टू-मार्केट फंडिंग और 12 बायो-पार्क के साथ 95 बायो-इनक्यूबेटर देश को वैश्विक डीप-साइंस नवाचार केंद्र बना रहे हैं।

कृषि जैव-प्रौद्योगिकी भी निरंतर उन्नति कर रही है। GM सरसों (DMH-11) जैसी फसलें 25–30% अधिक पैदावार की संभावना रखती हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों और नियामकीय अनिश्चितता के कारण कृषि बायोटेक का व्यावसायीकरण धीमा है।

इन उपलब्धियों के बावजूद कई गंभीर चुनौतियाँ भारत की जैव-अर्थव्यवस्था की रफ्तार को सीमित कर रही हैं। सबसे बड़ा अवरोध कम अनुसंधान निवेश है—भारत का GERD GDP का केवल 0.7% है, जबकि विश्व औसत 1.8% है। निजी क्षेत्र R&D में जोखिम लेने से बचता है, जिससे नवाचार का पैमाना सीमित रहता है। कृषि जैव-प्रौद्योगिकी में नीतिगत गतिरोध, बायोफार्मा और मेडटेक में 70–80% आयात निर्भरता, और डीप-साइंस स्टार्टअप्स के लिए फंडिंग गैप (वैली ऑफ डेथ) अभी भी चिंताएँ हैं।

इसके अतिरिक्त जैव-निर्माण अवसंरचना की भारी कमी, बड़े-स्तर के किण्वन संयंत्रों की अनुपस्थिति और शैक्षणिक शोध को पेटेंट एवं उत्पाद में बदलने की कमजोर क्षमता भी चुनौतियाँ हैं। भारत वैश्विक मेडटेक बाजार का केवल 1.5% हिस्सा रखता है। उच्च कौशल वाले बायो-एआई और सिंथेटिक बायोलॉजी विशेषज्ञों की कमी भी बाधक बन रही है।

फिर भी, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि BioE3 नीति का तेजी से क्रियान्वयन, नियामकीय आधुनिकीकरण, और पूंजी निवेश के नए रास्ते खोले जाएँ, तो भारत 2047 तक दुनिया की अग्रणी जैव-प्रौद्योगिकी महाशक्ति बन सकता है—जहाँ बायो-मैन्युफैक्चरिंग, जीनोमिक्स और बायोफार्मा देश की आर्थिक वृद्धि के नए इंजन होंगे।

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