भारत की डेटा सेंटर क्षमता 2032 तक 9 गीगावाट — डिजिटल भविष्य की नई छलांग

भारत डिजिटल क्रांति की दिशा में एक और ऐतिहासिक कदम बढ़ाने जा रहा है। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, देश की डेटा सेंटर क्षमता 2032 तक 9 गीगावाट तक पहुंचने की उम्मीद है — जो वर्तमान 1.2 गीगावाट से लगभग सात गुना वृद्धि दर्शाती है। यह तेज़ी 17% की वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) के साथ भारत को एशिया का नया डेटा हब बना सकती है।
डेटा सेंटर क्या होते हैं?
डेटा सेंटर वो डिजिटल इंजन हैं जो इंटरनेट, क्लाउड सर्विस, AI और मोबाइल नेटवर्क की रीढ़ हैं।
ये विशाल सुविधाएं होती हैं जहाँ सर्वर, नेटवर्किंग उपकरण और स्टोरेज सिस्टम डेटा का संग्रह, प्रबंधन और सुरक्षा करते हैं।
वर्तमान में भारत में लगभग 150 डेटा सेंटर संचालित हैं, जिनमें प्रमुख नाम हैं — Amazon Web Services (AWS), Microsoft Azure, Google Cloud और Yotta Infrastructure।
इनमें से 50% से अधिक केंद्र मुंबई में हैं, जबकि अहमदाबाद, पुणे और विशाखापत्तनम तेजी से उभरते हब बन रहे हैं।
मभारत में डेटा सेंटर के तेज़ विस्तार के पीछे 5 बड़े कारण
- डिजिटल जनसंख्या विस्फोट:
भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ता 751 मिलियन के पार हैं — जो विश्व की सबसे बड़ी ऑनलाइन आबादी में से एक है। - AI, 5G और IoT का विस्तार:
नई तकनीकें डेटा की खपत तीन गुना बढ़ा रही हैं, जिससे तेज़ और सक्षम डेटा सेंटरों की मांग लगातार बढ़ रही है। - डेटा लोकलाइजेशन कानून:
RBI और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 जैसे नियम कंपनियों को भारत में डेटा स्टोर करने के लिए बाध्य करते हैं। - आर्थिक बूस्ट:
यह सेक्टर ₹50,000 करोड़ से अधिक की आर्थिक गतिविधि और हजारों नई नौकरियों का सृजन करेगा (Crisil Ratings) - राष्ट्रीय सुरक्षा:
घरेलू डेटा भंडारण से भारत की डिजिटल संप्रभुता और साइबर सुरक्षा दोनों मजबूत होंगी।
सरकार की प्रमुख पहलें
डिजिटल इंडिया मिशन (2015): डेटा आधारित गवर्नेंस को बढ़ावा देने वाली मूल योजना।
राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC): देश के ई-गवर्नेंस ढांचे की रीढ़।
डेटा सेंटर को इंफ्रास्ट्रक्चर दर्जा: अब 5 मेगावाट से अधिक IT लोड वाले डेटा सेंटर इंफ्रा प्रोजेक्ट के रूप में मान्यता प्राप्त हैं।
राज्य स्तरीय नीतियाँ: महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्य विशेष डेटा सेंटर नीतियों के माध्यम से टैक्स छूट व निवेश प्रोत्साहन दे रहे हैं।
भारत के डेटा सेंटर सेक्टर की चुनौतियाँ
ऊर्जा और कूलिंग लागत:
देश की गर्म जलवायु में डेटा सेंटर का संचालन महंगा पड़ता है — जिससे लागत और कार्बन उत्सर्जन दोनों बढ़ते हैं।
कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय असंतुलन:
70% से अधिक सेंटर सिर्फ 3 शहरों में केंद्रित हैं। छोटे शहरों में ऊर्जा और नेटवर्क की कमी अब भी बाधा है।
कुशल मानव संसाधन की कमी:
साइबर सुरक्षा, क्लाउड इंजीनियरिंग और डेटा प्रबंधन में प्रशिक्षित प्रोफेशनल की भारी मांग है।
उच्च पूंजी निवेश:
लगभग 400 अरब डॉलर का अनुमानित निवेश चाहिए, जबकि रिटर्न मिलने में 10–15 साल तक लग सकते हैं।
भारत को डेटा महाशक्ति बनाने के उपाय
- हरित ऊर्जा का उपयोग:
सौर और पवन ऊर्जा से डेटा सेंटर को संचालित करने पर ज़ोर। - क्षेत्रीय संतुलन:
ठंडे इलाकों जैसे शिमला, देहरादून, चंडीगढ़ में नए डेटा पार्क विकसित कर शीतलन लागत घटाई जा सकती है। - नेशनल डेटा सेंटर अकादमी:
साइबर सुरक्षा और AI इंजीनियरिंग के लिए स्किल डेवलपमेंट पर बल। - सरलीकृत नीतियां:
भूमि आवंटन और अनुमोदन प्रक्रिया को सरल कर निवेशक-अनुकूल माहौल तैयार करना। - स्थायी नवाचार:
तरल शीतलन तकनीक और राष्ट्रीय फाइबर कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट डेटा स्थिरता और स्पीड दोनों बढ़ाएंगे।




