सुकमा में नक्सलियों ने चर्च और घरों में लगाई आग — पीड़ित बोले, पुलिस ने भी नहीं सुनी फरियाद

धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला या नक्सली दबाव? — सुकमा के सुदूर गांव में हिंसा से दहशत
सुकमा
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित सुकमा ज़िले से एक बार फिर हिंसा की भयावह तस्वीर सामने आई है। ग्राम सिमली (पंचायत मिलमपल्ली, थाना जगरगुंडा) में नक्सलियों ने 3 नवम्बर की शाम एक चर्च और घरों में आगजनी की, जिसमें कई लोगों के घायल होने की खबर है।
पीड़ितों के मुताबिक, नक्सलियों ने 200 से अधिक लोगों की भीड़ के साथ हमला किया। नक्सली मुचाकी देवा उर्फ कैलाश, झिथरू और संदीप के नेतृत्व में भीड़ ने देवा माडवी और मडकामी संतोष के घर और चर्च को जला दिया।


पीड़ितों ने बताया कि गांव के कुछ लोग — मडकामी सन्ना, मडकामी बोदा, कवासी देवा, और कवासी इड़मा — लगातार उन्हें चर्च जाने और बाइबल पढ़ने से रोक रहे थे। इन लोगों ने नक्सलियों को बुलाकर हमला करवाया।
गांव में पहले पंचायत भी बुलाई गई थी, जिसमें अधिकांश ग्रामीणों ने कहा था कि —
“ये लोग पिछले 25 सालों से शांति से रह रहे हैं, इन्होंने कोई धर्म परिवर्तन नहीं किया, बस भजन करते हैं, बाइबल पढ़ते हैं।”
इसके बावजूद नक्सलियों ने घरों में घुसकर मारपीट की, तोड़फोड़ की और आग लगा दी।
हमले के बाद पीड़ितों को धमकी दी गई —
“अगर पुलिस में रिपोर्ट दी तो जान से मार देंगे।”
प्रशासन और पुलिस पर आरोप
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जब पीड़ित थाना जगरगुंडा पहुंचे, तो उन्हें वहां से भगा दिया गया।
पीड़ितों का आरोप है कि पुलिस ने कहा —
“पहले अपने आधार कार्ड में ‘क्रिश्चियन’ लिखवाओ, फिर रिपोर्ट दर्ज होगी।”
इस रवैये से पीड़ितों ने खुद को असुरक्षित महसूस किया और अब वे जंगल में छिपकर अपनी जान बचा रहे हैं।
पीड़ितों की पुकार (रायपुर प्रेस क्लब में बयान)
रायपुर में प्रेस क्लब पहुंचकर पीड़ितों ने कहा —
“हमने किसी का धर्म नहीं बदला, बस अपनी आस्था के अनुसार पूजा करते हैं। फिर भी हमें गांव से निकालने की साजिश रची गई। नक्सलियों ने हमला किया और पुलिस ने भी मदद नहीं की।”
सवाल
सरकार का दावा है कि नक्सलवाद अब खत्म हो रहा है, लेकिन यह घटना कई सवाल खड़े करती है —
अगर नक्सलवाद खत्म हो गया है, तो यह नया नक्सली समूह कौन है?
धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला करने वालों को संरक्षण कौन दे रहा है?
क्या यह केवल नक्सली हिंसा है, या इसके पीछे धर्म और राजनीति की साजिश भी छिपी है?
और सबसे बड़ा सवाल — जब संविधान सभी को अपने धर्म का पालन करने की आज़ादी देता है, तो प्रशासन चुप क्यों है?
सुकमा की यह घटना केवल नक्सली हिंसा नहीं, बल्कि आस्था और संवैधानिक अधिकारों पर हमला है।
जरूरत है कि सरकार, पुलिस और मानवाधिकार आयोग मिलकर तथ्यों की निष्पक्ष जांच करें, ताकि सच्चाई सामने आ सके और निर्दोषों को न्याय मिल सके।




