सरकारी दफ्तर में न इंसाफ, न सुविधा — छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

बिलासपुर
राज्य की न्यायपालिका ने एक बार फिर प्रशासन की लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाया है। बिलासपुर स्थित एक सरकारी भवन में दिव्यांग कर्मचारियों और आम लोगों के लिए मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया है।
जानकारी के अनुसार, इस तीन मंजिला सरकारी इमारत में पिछले छह महीनों से लिफ्ट खराब पड़ी है, जिससे दिव्यांग कर्मचारी और वरिष्ठ नागरिकों को ऊपर-नीचे आने-जाने में गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं, भवन में पीने के स्वच्छ पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी लंबे समय से अनुपलब्ध हैं।

मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने इस स्थिति पर नाराजगी जताई और संबंधित विभाग को विस्तृत जवाब दाखिल करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि “जब सरकारी कर्मचारी खुद ही असुविधाओं का सामना कर रहे हैं, तो आम नागरिकों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि दिव्यांग कर्मचारियों को समान कार्यस्थल-सुविधाएँ देना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। इस मामले को अब अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है, और सरकार से रिपोर्ट मांगी गई है कि कब तक लिफ्ट और अन्य सुविधाएँ चालू होंगी।
यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। छत्तीसगढ़ सरकार की ‘समावेशी विकास’ नीति पर भी यह एक व्यावहारिक परीक्षण है — क्या सरकारी भवन ही दिव्यांगजन-अनुकूल नहीं हैं, तो योजनाओं की जमीनी हकीकत क्या होगी?




