कोरबा में धान खरीदी व्यवस्था ने किसानों को मजबूर किया ज़हर खाने पर

सरोज कुमार रात्रे
कोरबा, छत्तीसगढ़
काग़ज़ों में किसान खुश…
भाषणों में किसान सम्मान…
लेकिन ज़मीनी हकीकत में किसान ज़हर खा रहा है।
कोरबा में 24 घंटे के भीतर दूसरा किसान आत्महत्या के प्रयास को मजबूर—
यह सिर्फ़ खबर नहीं, सिस्टम पर सीधा आरोप है।
कोरबा जिले में धान खरीदी व्यवस्था अब किसानों की जान पर भारी पड़ने लगी है।
हरदी बाजार थाना क्षेत्र के झांझ गांव के
60 वर्षीय आदिवासी किसान बैसाखू मरकाम ने
धान नहीं बिकने, रकबा कम दर्ज होने और महीनों की दौड़ के बाद
तहसील कार्यालय के बाहर ज़हर पी लिया।
किसान की हालत नाज़ुक है,
उसे बिलासपुर मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया है।
किसान का कसूर सिर्फ़ इतना था कि
उसने मेहनत से धान उगाया…
लेकिन ऑनलाइन रिकॉर्ड में रकबा काट दिया गया।
15 क्विंटल से ज़्यादा धान बेचने की इजाज़त नहीं मिली।
पटवारी, तहसील और कार्यालयों के चक्कर काटते-काटते
किसान थक गया…
और सिस्टम नहीं पसीजा।
यह कोई अकेली घटना नहीं है।
इसी 24 घंटे में ग्राम पुटा के किसान सुमेर सिंह ने भी
धान बिक्री का टोकन नहीं मिलने से हताश होकर
कीटनाशक पी लिया।
यानी सवाल साफ़ है—
क्या धान खरीदी व्यवस्था किसानों को मौत की ओर धकेल रही है?
जब सरकार कहती है
धान खरीदी सुचारू है
टोकन की कोई समस्या नहीं
किसान संतुष्ट हैं
तो फिर
किसान ज़हर क्यों खा रहा है?
अगर जनदर्शन में भी किसान की नहीं सुनी जाती,
तो जनदर्शन किसके लिए है?
इन घटनाओं के बाद
युवक कांग्रेस सड़कों पर उतर आई।
कलेक्ट्रेट के बाहर कफ़न ओढ़कर प्रदर्शन,
भाजपा सरकार, प्रशासन और स्थानीय विधायकों के खिलाफ
जोरदार नारेबाज़ी।
आरोप साफ़ है—
धान खरीदी में लापरवाही, टोकन अव्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनहीनता
किसानों की जान ले रही है।


“आदिवासी मुख्यमंत्री की सरकार में
आदिवासी किसान ज़हर खा रहा है।
अगर जिम्मेदार अधिकारियों, फड़ प्रभारी, तहसीलदार, कलेक्टर
और नेताओं पर कार्रवाई नहीं हुई
तो यह लड़ाई सड़क से संसद तक जाएगी।”
वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व गृह मंत्री
ननकी राम कंवर ने घटना को दुखद बताया,
लेकिन सवाल यह है—
क्या सिर्फ़ दुख जताने से सिस्टम सुधरेगा?
धान खेत में है…
किसान ज़हर खाकर अस्पताल में…
और सिस्टम अब भी सफ़ाई दे रहा है।
यह सिर्फ़ आत्महत्या का प्रयास नहीं—
यह धान खरीदी व्यवस्था, प्रशासन और सत्ता के दावों पर
सबसे बड़ा सवाल है।
अब देखना यह है कि
किसान के ज़हर खाने के बाद
कोई जवाबदेही तय होती है
या फिर यह मामला भी
फाइलों में दबा दिया जाएगा।




