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कानून के रखवालों पर सवाल — न्याय नहीं, दबाव का तंत्र?


रिपोर्टर-के. पी. चंद्राकर /लोकेशन -बालोद,

छत्तीसगढ़ के बालोद ज़िले से सामने आया यह मामला सिर्फ़ एक व्यक्ति की मौत की खबर नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर बड़ा सवाल है, जिसका काम नागरिकों को सुरक्षा देना है।
पुरूर थाना क्षेत्र से जुड़ा यह मामला अब पुलिस की भूमिका को कठघरे में खड़ा कर रहा है।

आरोप है कि बालोद ज़िले के पुलिस थाना पुरूर क्षेत्र में शराब और नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में कार्रवाई के बजाय कथित तौर पर वसूली का तंत्र चलाया जा रहा था।
जो रकम दे दे — वह बच जाए,
और जो न दे सके — उसे अपराधी बना दिया जाए।
मृतक पुराणिक जोशी पर बार-बार दबाव बनाए जाने के आरोप हैं।
उन्हें लगातार थाने बुलाया गया, मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और आर्थिक मांगें पूरी न कर पाने पर डर व अपमान के दायरे में रखा गया।
परिवार का आरोप है कि इसी मानसिक उत्पीड़न के चलते पुराणिक जोशी टूट गए और यह घटना आत्महत्या का रूप ले बैठी।
जब कानून की रखवाली करने वाली संस्था ही भय का कारण बन जाए,
तो आम नागरिक आखिर किस पर भरोसा करे?
यह मामला केवल एक आत्महत्या नहीं,
बल्कि उस कथित मानसिक प्रताड़ना की कहानी है,
जो कानून की आड़ में अंजाम दिए जाने का आरोप झेल रही है।
अब सवाल साफ़ हैं —
अगर ये आरोप सही हैं,
तो क्या यह वर्दी का दुरुपयोग नहीं?
क्या यह पूरी न्याय व्यवस्था की आत्मा पर हमला नहीं?
जवाब चाहिए…
और जवाबदेही भी।

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