AI की आंधी में भारतीय IT का रीबूट: कंपनियाँ नए मॉडल की तलाश में, पुरानी रणनीति फेल

भारतीय आईटी सेक्टर तेज़ी से बदलती तकनीकी दुनिया के सबसे बड़े मोड़ पर खड़ा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के तेज़ विस्तार ने पारंपरिक आईटी सर्विस मॉडल को चुनौती दे दी है। तीन दशक तक “कम लागत–ज़्यादा आउटसोर्सिंग” पर चलने वाला यह उद्योग अब धीमी वृद्धि, मार्जिन दबाव और कम होते ग्लोबल कॉन्ट्रैक्ट्स के कारण भारी दबाव झेल रहा है।
विप्रो, TCS से लेकर इंफोसिस तक—सभी दिग्गज कंपनियों ने पिछले एक साल में गिरती ग्रोथ और घटते मुनाफे को स्वीकार किया है। ग्राहकों ने बड़े ट्रांसफॉर्मेशन प्रोजेक्ट्स पर खर्च सीमित कर दिया है और एआई आधारित समाधान की माँग तेजी से बढ़ रही है।
आईटी विश्लेषकों का कहना है कि एआई ने एंट्री-लेवल इंजीनियरों की जरूरत को कम कर दिया है और कंपनियों को उच्च-मूल्य वाली, नवाचार-आधारित सेवाओं पर शिफ्ट होना होगा।
दूसरी तरफ, Global Capability Centers (GCCs) भारत में ही सीधे संचालन बढ़ा रहे हैं, जिससे आईटी सर्विस कंपनियों के पारंपरिक बिजनेस को और नुकसान हुआ है।

TCS और अन्य कंपनियाँ अब बड़े पैमाने पर AI, डेटा सेंटर और इनोवेशन लैब्स में निवेश कर रही हैं, ताकि अगले 2-3 वर्षों में एआई आधारित राजस्व बढ़ाया जा सके। वहीं कई कंपनियों में स्वचालन के कारण छंटनी भी तेज़ है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव 1990 के दशक की ऑफशोरिंग क्रांति के बाद सबसे बड़ा परिवर्तन है।
उद्योग को अब पुराने मॉडल से निकलकर—
एआई-फर्स्ट रणनीति,
डोमेन-विशेषज्ञ प्रतिभा,
परिणाम-आधारित कॉन्ट्रैक्ट, और
सॉफ्टवेयर + ह्यूमन हाइब्रिड डिलीवरी
की ओर बढ़ना होगा।
भारतीय आईटी के लिए यह दौर सिर्फ चुनौती नहीं, बल्कि अस्तित्व की परीक्षा भी है। कंपनियाँ जितनी तेज़ी से एआई को अपनाएंगी, उनकी नई पहचान उतनी ही मज़बूत होगी।




