अर्थशास्त्र

डॉलर के सामने रुपया सतर्क: वैश्विक संकेतों के बीच सीमित दायरे में कारोबार

विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये की चाल पर इस समय वैश्विक आर्थिक हालात का साफ असर देखने को मिल रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपया फिलहाल सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव के साथ कारोबार करता नजर आ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी मुख्य वजह कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और विदेशी निवेशकों का रुख है।
रुपये की चाल को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारण

भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने पर आयात महंगा होता है, जिससे रुपये पर दबाव बनता है।


शेयर और बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों की खरीद-फरोख्त का सीधा असर रुपये की मजबूती और कमजोरी पर पड़ता है। निवेश बढ़ने से रुपया मजबूत होता है, जबकि पूंजी निकासी से दबाव बढ़ता है।

अमेरिका और यूरोप की ब्याज दर नीतियां, महंगाई के आंकड़े और भू-राजनीतिक हालात डॉलर को मजबूत या कमजोर बनाते हैं, जिसका असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं पर पड़ता है।

भारतीय रिजर्व बैंक बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप करता है, ताकि मुद्रा में स्थिरता बनी रहे।

विशेषज्ञों का कहना है कि
रुपया कमजोर होने से आयात महंगा होता है, जिससे ईंधन और जरूरी सामान की कीमतें बढ़ सकती हैं।
रुपया मजबूत होने पर आयात सस्ता होता है, लेकिन निर्यातकों को चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
इस तरह रुपये की चाल का सीधा असर आयात-निर्यात, महंगाई और आम उपभोक्ता की जेब पर पड़ता है।

आने वाले दिनों में
वैश्विक बाजार की दिशा
तेल की कीमतें
विदेशी निवेश के आंकड़े
रुपये की चाल तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

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