सतयुग ही था सृष्टि का स्वर्णिम काल, संगम युग में आत्म परिवर्तन से भारत बनेगा पुनः विश्वगुरु – शशिप्रभा दीदी

रिपोर्टर :शुभांशु मिश्रा
लोकेशन :चांपा
चांपा में श्रीमद् भगवत गीता सार – सुखद जीवन का आधार ज्ञानयज्ञ के छठवें दिन ब्रह्माकुमारी शशिप्रभा दीदी ने सृष्टि परिवर्तन और आत्मिक उत्थान का गूढ़ संदेश दिया। लक्ष्मी टाइपिंग, हजारी गली, अम्बे रेसिडेंसी में आयोजित कार्यक्रम में शशिप्रभा दीदी ने कहा कि परमात्मा सूर्य, चंद्र और तारों से परे परमधाम के निवासी हैं और परम पवित्र हैं। वही परमात्मा इस धरा पर अवतरित होकर सृष्टि के नूतन परिवर्तन का कार्य कराते हैं।उन्होंने बताया कि सृष्टि का आदि काल सतयुग था, जिसे स्वर्ण काल कहा गया है। गीता के 15वें अध्याय का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सृष्टि उल्टे कल्पवृक्ष के समान है, जिसकी जड़ ऊपर परमात्मा है और शाखाएं नीचे मनुष्य आत्माएं। सतयुग में श्री राधा–कृष्ण, जो स्वयंवर के पश्चात श्री लक्ष्मी–नारायण कहलाए, उनके राज्य में घी-दूध की नदियां बहती थीं और दुनिया संपूर्ण सुख, शांति व समृद्धि से परिपूर्ण थी।



शशिप्रभा दीदी ने कहा कि वर्तमान समय सृष्टि परिवर्तन का संधिकाल है, जिसे परमात्मा ने संगम युग कहा है। इस युग में हर आत्मा अर्जुन के समान स्वयं में श्रेष्ठ संस्कारों का विकास कर सतयुगी दिव्य संस्कारों को धारण कर सकती है। उन्होंने कहा कि सृष्टि को सतयुग से कलयुग बनाने में मनुष्य आत्माओं की भूमिका रही है और अब कलयुग से सतयुग बनाने की जिम्मेदारी भी हमें ही निभानी होगी। आहार, व्यवहार, विचार और संस्कारों को दिव्य बनाकर भारत पुनः सोने की चिड़िया और विश्वगुरु बन सकता है।कार्यक्रम का आयोजन श्री लक्ष्मीचंद देवांगन एवं श्रीमती उमा देवांगन ने अपने दिवंगत माता–पिता स्वर्गीय जगन्नाथ देवांगन एवं सहोदर बाई की स्मृति में वार्षिक श्राद्ध अवसर पर किया। कार्यक्रम में अतिथि के रूप में श्री अमर सुल्तानिया, भाजपा मंडल अध्यक्ष चांपा श्री संतोष थवाईत, डॉ. रमाकांत सोनी, श्री महावीर सोनी, श्रीमती अन्नपूर्णा सोनी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे, जिन्होंने गीता सार अमृत का रसपान किया।




