जांजगीर-चांपा

जांजगीर-चांपा जिले की जर्जर आंगनबाड़ीयों की वास्तविक स्थिति को प्रभावी एवं भावुक अंदाज़ में दिखाते हुए

“आंगनबाड़ी अपने आँसू रो रही”

जांजगीर-चांपा

जिले की आंगबाड़ीयों की तस्वीरें आज किसी दर्द भरी कहानी से कम नहीं।
जहाँ छोटे-छोटे बच्चे अपनी मासूम मुस्कान के साथ अक्षरों का संसार सीखने आते हैं…
जहाँ उनके व्यक्तित्व की पहली नींव रखी जाती है…
उन्हीं स्थानों की दीवारें आज टूट रही हैं, छतें झड़ रही हैं और फर्श बच्चों के पैरों के लिए भी सुरक्षित नहीं।

कैमरे में कैद ये दृश्य दिल को झकझोर देने वाले हैं।
कई आंगनबाड़ी भवन इतने जर्जर हो चुके हैं कि देखने से ही खतरे का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
कहीं दीवारों पर गहरी दरारें हैं, कहीं छत भरभराकर गिरने को तैयार है।
कुछ भवनों की हालत इतनी खराब है कि हल्की बारिश भी भीतर बैठे बच्चों और कार्यकर्ताओं की जान पर बन सकती है।

मासूम बच्चे, जो आंगनवाड़ी में खेल-खेल में पढ़ने का ज्ञान लेने आते हैं…
अब डर और असुरक्षा वाले माहौल में मजबूरी में बैठते हैं।
जहाँ उन्हें अक्षर सीखना चाहिए, रंग भरना चाहिए, गीत गाना चाहिए—
वहीं कई बच्चे छत से गिरते प्लास्टर और टूटे फर्श से बचते हुए दिखाई देते हैं।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी असहाय हैं।
उनका कर्तव्य है बच्चों को पोषण देना, शिक्षा देना, सुरक्षित माहौल देना…
लेकिन जब भवन ही गिरने को तैयार हो, तो सुरक्षा कैसे दी जाए?
कार्यकर्ता रोजाना बच्चों को सुरक्षित जगह ढूँढकर बैठाने की जद्दोजहद करती हैं।
कभी वे बच्चों को कमरे के किसी कोने में बचाकर रखती हैं, कभी बाहर के किसी पेड़ के नीचे पढ़ाती हैं पंचायत भवन में…
और कभी अचानक से बारिश होने पर घबराकर बच्चों को घर भेजने तक की नौबत आ जाती है।

ऐसे हालात में बच्चों के अभिभावक भी चिंतित हैं।
कई माता-पिता ने स्पष्ट कहा—
“हम बच्चों को भेजना चाहते हैं, लेकिन जो भवन है वह खतरा बन चुका है। डर लगता है, कोई हादसा न हो जाए।”

जब इस गंभीर मुद्दे पर अधिकारियों से बात की गई तो जवाब बेहद निराशाजनक था।
अधिकारी का कहना था—
“भवन निर्माण या मरम्मत के लिए हमारी तरफ से फिलहाल कोई फंड स्वीकृत नहीं हुआ है।”
यानी बच्चे, कार्यकर्ता और पूरा केंद्र फिलहाल किस्मत के भरोसे चल रहा है।

एक ओर सरकार की योजनाएँ कागज़ों में कहती हैं कि कुपोषण मिटाना है, प्रारंभिक शिक्षा को मजबूत बनाना है,
और दूसरी ओर जांजगीर-चांपा की आंगनबाड़ीयाँ एक सुरक्षित चारदीवारी के लिए तरस रही हैं।

राज्य और केंद्र – दोनों स्तर पर आंगनबाड़ी प्रणाली को मजबूत बनाने का दावा होता है,
लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि कई भवन दशकों से मरम्मत का इंतज़ार कर रहे हैं।
कई जगह बच्चों को दरी तक नसीब नहीं, कहीं पीने का पानी नहीं, कहीं शौचालयों की हालत बेहद खराब।
और सबसे बड़ी समस्या—
भवन की जर्जर स्थिति, जो किसी भी दिन एक बड़े हादसे की वजह बन सकती है।

सबसे दुखद बात यह है कि यह समस्या नई नहीं है।
कार्यकर्ता और ग्रामीण कई बार शिकायत कर चुके हैं, कई बार प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं,
लेकिन फाइलें कहाँ अटक जाती हैं—किसे पता?

इन मासूम बच्चों की मुस्कान, उनका भविष्य, उनका अधिकार—
क्या ये सब सिर्फ फंड की कमी के कारण अधर में लटका रहेगा?

सरकारें बदलती हैं, योजनाएँ आती-जाती रहती हैं,
लेकिन आंगनवाड़ी की ये जर्जर दीवारें जितनी पुरानी हो रही हैं,
उतनी ही नई पीढ़ी का भविष्य कमजोर होता जा रहा है।

इस स्पेशल रिपोर्ट का सबसे बड़ा सवाल सरकार और प्रशासन से यह है

आखिर इन मासूमों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
कब मिलेगा इन बच्चों को एक सुरक्षित, मजबूत और सम्मानजनक आंगनबाड़ी भवन?

क्योंकि अगर नींव ही कमजोर हो…
तो मज़बूत भविष्य कैसे बनेगा?

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