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तांदुला में श्रमदान का जज़्बा, मशीनों से नदी को चोट — दोहरी नीति पर सवाल

के पी चंद्राकर

तांदुला नदी तट, बालोद

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में जीवनदायिनी तांदुला नदी… आज चर्चा में है दो बिल्कुल अलग तस्वीरों की वजह से।एक तरफ… नदी तट पर जुटे सैकड़ों लोग… जिन्होंने श्रमदान कर यह साबित किया कि समाज आज भी प्रकृति के लिए खड़ा हो सकता है।कंधों पर फावड़ा… हाथों में संकल्प… और दिल में नदी को बचाने का जुनून।लेकिन दूसरी तरफ… कुछ ही दिन पहले मशीनों की गर्जना ने तांदुला की रगों को घायल कर दिया।चैन माउंटेन मशीनों से की गई यह सफाई…न तो वैज्ञानिक…न ही कानूनी प्रक्रिया के तहत।सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी कर किए गए इस काम ने नदी के प्राकृतिक संतुलन को चुनौती दे दी है।

सवाल ये उठता है —जब समाज श्रमदान से जागरूकता फैला रहा था…तो उसी समय प्रशासन की मशीनें क्यों विनाश बो रही थीं?क्या यह विरोधाभास प्रशासनिक नीति की कमी है…या नीयत में खोट?तांदुला के सवाल पर आज जनता का जनमत साफ है —नदी संरक्षण केवल आयोजन से नहीं… बल्कि संवेदनशील और ईमानदार फैसलों से होगा।अंत में… तांदुला की पुकार यही है —उसे बचाने की कोशिशें समग्र हों…प्रतिष्ठा के लिए नहीं…जीवन के लिए।

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