फागुन की थाप फीकी पड़ती विरासत: नगाड़ों की गूंज अब यादों में

रिपोर्टर-जय ठाकुर/लोकेशन-जांजगीर-चांपा
फागुन लगते ही कभी गांवों की फिजा बदल जाया करती थी। होली से कई दिन पहले ही चौपालों पर नगाड़ों की थाप, ढोल-मंजीरों की संगत और फाग गीतों की गूंज सुनाई देने लगती थी। लेकिन बदलते वक्त और आधुनिक जीवनशैली के चलते यह समृद्ध लोकपरंपरा अब धीरे-धीरे सिमटती जा रही है। आज की हमारी खास रिपोर्ट उसी बदलती सांस्कृतिक तस्वीर पर।
फागुन का महीना शुरू होते ही गांवों में उत्सव का माहौल बन जाता था। होली आने से हफ्ते भर पहले चौपालों पर नगाड़ों की थाप गूंजती, ढोल-मंजीरे और झाल के साथ फाग गीतों की महफिल सजती। बुजुर्ग अपनी विरासत के गीत छेड़ते, युवा सुर में सुर मिलाते और बच्चे तालियां बजाकर उत्साह बढ़ाते।
नगाड़े की हर थाप मानो यही संदेश देती थी कि होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि आपसी मेलजोल और सामाजिक एकता का पर्व है।

गांव की गलियों में फाग गाते हुए टोलियां निकलतीं, एक घर से दूसरे घर तक लोग पहुंचते। महिलाएं अलग समूह में पारंपरिक होरी गातीं। घर-घर से गुजिया और पकवानों की खुशबू आती और पूरा गांव अपनत्व से भर उठता। उस दौर में होली सिर्फ एक दिन का नहीं, बल्कि पूरे सप्ताह चलने वाला सांस्कृतिक उत्सव हुआ करता था।
लेकिन समय के साथ यह परंपरा कमजोर होती चली गई। डीजे और तेज धुनों ने लोकनगाड़ों की जगह ले ली है। नई पीढ़ी मोबाइल और सोशल मीडिया में व्यस्त है, जिससे सामूहिक लोकगायन की संस्कृति प्रभावित हो रही है। अब नगाड़ों की थाप केवल गिने-चुने गांवों तक ही सीमित रह गई है।
हालांकि, कुछ गांवों और सांस्कृतिक समितियों द्वारा इस परंपरा को जीवित रखने के प्रयास किए जा रहे हैं। यदि समाज मिलकर पहल करे, तो फागुन की वही पुरानी रौनक और नगाड़ों की गूंज एक बार फिर गांवों की पहचान बन सकती है।




