पहाड़ काटकर सड़क बना रहे ग्रामीणों की जिद ने खोली विकास की हकीकत

जब नहीं आई सरकारी मदद, तब फावड़ा–कुदाल लेकर खुद सड़क पर उतरे आदिवासी ग्रामीण
कोण्डागांव
आज़ादी के 79 साल बाद भी विकास की दौड़ में पीछे छूटे आदिवासी अंचल के ग्रामीणों ने अब अपनी तकदीर खुद लिखनी शुरू कर दी है। शासन-प्रशासन की अनदेखी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से त्रस्त कुएंमारी क्षेत्र के ग्रामीणों ने पहाड़ को काटकर खुद सड़क बनाने का बीड़ा उठाया है।
यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं, बल्कि केशकाल विधानसभा क्षेत्र के ग्राम पंचायत होनेहेड के आश्रित गांव नंदगट्टा का है, जो विकासखंड मुख्यालय से लगभग 45 से 50 किलोमीटर दूर बसा हुआ है।
गांव तक पहुंचने का कोई पक्का रास्ता न होने से ग्रामीणों को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत कुएंमारी तक तो पक्की सड़क बन गई, लेकिन कुएंमारी से आगे बसे गांवों तक पहुंचने के लिए अब भी कोई सड़क नहीं है। ग्रामीणों को पहाड़ी रास्तों, झाड़ियों और पत्थरों के बीच से गुजरना पड़ता है — बरसात में हालात और भी खराब हो जाते हैं।
सरपंच, विधायक और कलेक्टर तक को कई बार शिकायतें और मांगपत्र दिए गए, लेकिन हर बार सिर्फ़ आश्वासन ही मिला। आखिरकार, निराश होकर ग्रामीणों ने खुद ही सड़क बनाने का फैसला किया।
पिछले एक महीने से रोज़ाना गांव के प्रत्येक घर से दो-तीन सदस्य अपने-अपने औजार — फावड़ा, कुदाल, गैती, कुल्हाड़ी और साबल लेकर निकल पड़ते हैं। सामूहिक श्रमदान से लोग पहाड़ की चट्टानों को काटकर सड़क तैयार कर रहे हैं।
गांव के बुजुर्गों का कहना है — “सरकार से मदद की उम्मीद खत्म हो गई, अब हम खुद अपने बच्चों के लिए रास्ता बनाएंगे ताकि उन्हें स्कूल, अस्पताल और बाजार तक पहुंचने में दिक्कत न हो।”
यह घटना न केवल प्रशासन की सुस्ती का आईना दिखाती है, बल्कि ग्रामीणों की अटूट इच्छाशक्ति और एकजुटता का भी उदाहरण पेश करती है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से ग्रामीणों ने एक बार फिर मांग की है कि उनकी इस मेहनत को शासन स्तर पर मान्यता मिले और अधूरी सड़क को सरकारी योजना के तहत पूरा किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को दुश्वारियों से न गुजरना पड़े।



