कलेक्टर ऑफिस का बरांडा बना बाइक स्टैंड — व्यवस्था संभालने वाले ही तोड़ रहे नियम

जांजगीर-चांपा
जिले के कलेक्टर ऑफिस परिसर में अव्यवस्था का एक बड़ा उदाहरण सामने आया है। जहां जनता की सुविधा के लिए बनाया गया बरांडा अब बाइक पार्किंग में तब्दील हो गया है। विडंबना यह है कि यहां खड़ी अधिकतर गाड़ियाँ सरकारी कर्मचारियों की हैं, जिससे आम नागरिकों को चलने में दिक्कत हो रही है।
जिले के कलेक्टर ऑफिस के पीछे बने बरांडे का उद्देश्य था—लोगों को मुख्य भवन तक आसानी से पहुंचने के लिए सुरक्षित पैदल रास्ता देना। लेकिन अब यही बरांडा नागरिकों की परेशानी का सबब बन गया है। यह बरांडा अब एक ‘बाइक स्टैंड’ में तब्दील हो गया है, जहाँ हर वक्त कई सरकारी बाइक्स खड़ी रहती हैं।


दरअसल, यह बरांडा खनिज विभाग के दफ्तर से सटा हुआ है। यहां रोजाना सैकड़ों लोग अपने काम से कलेक्टर ऑफिस और अन्य प्रशासनिक विभागों में पहुंचते हैं। मगर अब यह रास्ता दोपहिया वाहनों से अटा पड़ा रहता है। लोगों को साइड से, सड़क किनारे से निकलना पड़ता है — जिससे दुर्घटना का खतरा भी बढ़ गया है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह स्थिति नई नहीं है, बल्कि महीनों से यही हाल है। हैरानी की बात यह है कि जो कर्मचारी जनता के लिए व्यवस्था बनाने और उसे बनाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं, वही इस अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार बने हुए हैं।
एक स्थानीय नागरिक ने बताया —
“बरांडा तो चलने के लिए बना था, लेकिन अब वहां बाइकें खड़ी रहती हैं। हमें साइड से निकलना पड़ता है।”
नियमों की यह अनदेखी केवल नागरिकों के लिए असुविधा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का भी बड़ा उदाहरण है। कलेक्टर ऑफिस परिसर में रोज आम नागरिक अपने काम से आते हैं, वहीं मंत्री और जनप्रतिनिधियों की बैठकें भी होती हैं। इसके बावजूद इस बदइंतजामी पर किसी की नजर नहीं जा रही।
बरांडा से सटे खनिज विभाग के अधिकारी और कर्मचारी रोज इसी रास्ते से गुजरते हैं, लेकिन उन्होंने भी अब तक इस पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की है।
प्रशासन पर उठे सवाल
क्या कलेक्टर ऑफिस परिसर में ही नियमों की अनदेखी सामान्य बात बन चुकी है?
अगर सरकारी दफ्तरों में ही अनुशासन और व्यवस्था नहीं दिखेगी, तो बाकी विभागों से कैसी उम्मीद की जा सकती है?
क्या जिम्मेदार अधिकारी इस स्थिति पर अब कार्रवाई करेंगे?
जिस बरांडे से जनता को सुविधा मिलनी थी, वही अब बन गया है असुविधा का प्रतीक। यह मामला न केवल अव्यवस्था का, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी सवाल उठाता है। अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन इस पर कोई ठोस कदम उठाएगा, या जनता यूं ही सरकारी बाइकों के बीच रास्ता खोजती रहेगी।




