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कर्म, अकर्म और विकर्म की गुह्य गति को समझना ही सुखद जीवन का आधार : शशिप्रभा दीदीचाम्पा में श्रीमद् भगवद् गीता सार प्रवचन के चौथे दिन उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब

नगर में आयोजित श्रीमद् भगवद् गीता सार – सुखद जीवन का आधार कार्यक्रम के चौथे दिन ब्रह्माकुमारी शशिप्रभा दीदी जी ने गीता के गूढ़ रहस्यों को सरल शब्दों में समझाते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन का प्रत्येक सुख-दुःख उसके कर्मों से ही जुड़ा होता है। आत्मा अपने 84 जन्मों की यात्रा में जैसे कर्म करती है, वैसा ही फल उसे भोगना पड़ता है।
दीदी जी ने प्रवचन के दौरान बताया कि आज हर व्यक्ति के मन में यह प्रश्न उठता है कि “मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?” इस जिज्ञासा का उत्तर उन्होंने महाभारत की प्रेरक कथा के माध्यम से दिया। उन्होंने कहा कि जब भीष्म पितामह बाणों की शय्या पर लेटे हुए भगवान श्रीकृष्ण से अपने कष्ट का कारण पूछते हैं, तो भगवान उन्हें कर्मों की गुह्य गति समझाते हैं। भगवान बताते हैं कि पूर्व जन्मों के पुण्य कर्म अधिक होने के कारण कुछ पाप कर्मों का दंड देर से मिलता है।
दीदी जी ने कहा कि कर्म का फल टल सकता है, पर टलता नहीं। अच्छे कर्मों का फल शुभ और बुरे कर्मों का फल अशुभ ही होता है, चाहे वह इस जन्म में मिले या आने वाले जन्मों में। इसलिए मानव जीवन का उद्देश्य सदैव पुण्य कर्म करना होना चाहिए।


प्रवचन के दौरान दीदी जी ने हिंसा और अहिंसा पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज “घर-घर महाभारत” की स्थिति है, इसलिए गीता ज्ञान की आवश्यकता समाज के हर व्यक्ति को है। अपने स्वार्थ के लिए किसी जीव की हत्या कर उसे भोजन बनाना भी हिंसा है, क्योंकि उस जीव के भीतर भी चेतना है और उसे भी उतना ही दर्द होता है।
साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न पहुंचाना ही सच्ची अहिंसा है।
दीदी जी ने कर्म, अकर्म और विकर्म के अंतर को समझाते हुए बताया कि
सतयुग में किए गए कर्म प्रारब्ध के अनुसार होने से कर्म कहलाते हैं।
द्वापर युग से देहभान और विकारों के वशीभूत होकर किए गए कर्म विकर्म या पाप कर्म बन जाते हैं, जिनका फल दुःख के रूप में भोगना पड़ता है।
कार्यक्रम के यजमान स्वरूप श्री लक्ष्मीचंद देवांगन एवं श्रीमती उमा देवांगन ने श्रद्धालुओं का स्वागत-अभिनंदन करते हुए आगामी दिनों में अधिक से अधिक संख्या में प्रवचन का लाभ लेने का आह्वान किया।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में श्री आशुतोष गोस्वामी, श्री राजेंद्र शर्मा (ज्योतिष, जांजगीर), श्री मोहन यादव, श्री बुटू देवांगन सहित अनेक गणमान्य नागरिक एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा, शांति और आत्ममंथन से ओतप्रोत रहा।

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