
एक किलोमीटर कीचड़ भरे रास्ते पर शव को कंधे पर ले जाने को मजबूर ग्रामीण; विकास के दावों की खुली पोल!
हमारी अदालतों ने बार-बार कहा है कि गरिमा और उचित व्यवहार का हक न केवल जीवित व्यक्ति को हो बल्कि यह मृत्यु के बाद भी बना रहना चाहिए,
संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार व्यक्ति को सिर्फ जीने का अधिकार नहीं देता, बल्कि ‘मर्यादा’ के साथ जीने और विदा होने का अधिकार भी देता है।”



लेकिन सक्ति जिले से आई एक तस्वीर ने इंसानियत को शर्मसार और सरकारी दावों को बेनकाब कर दिया है। जहाँ एक तरफ सरकार हर गाँव को चमचमाती सड़कों से जोड़ने का दम भरती है, वहीं जिला मुख्यालय से महज 1 किलोमीटर दूर बसा ‘सोंठी’ गाँव आज भी मध्यकालीन दौर के अभिशाप को झेल रहा है। यहाँ बुनियादी सुविधाओं का ऐसा अकाल है कि एक बेबस परिवार को अपनी बुजुर्ग मां के शव को अंतिम संस्कार के लिए घुटने तक भरे कीचड़ और दलदल से होकर ले जाना पड़ा। आँसू और बारिश के पानी के बीच, अपनों के शव को कंधे पर उठाए ग्रामीणों की ये तस्वीरें चीख-चीखकर शासन-प्रशासन से सवाल पूछ रही हैं।”
सक्ति जिले के ग्राम पंचायत सोंठी में रहने वाली 60 वर्षीय कमलाबाई महंत अब इस दुनिया में नहीं हैं। बीमारी के बाद जब उनकी सांसें थमीं, तो परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन असली प्रताड़ना तो अभी बाकी थी। 3 जुलाई की सुबह जब नम आँखों से परिजन और ग्रामीण शव को अंतिम विदाई देने के लिए निकले, तो उनके सामने श्मशान घाट जाने का नहीं, बल्कि ‘नर्क’ का रास्ता था।
घुटने भर कीचड़ और उफनती नदी के बीच ‘अंतिम यात्रा’
हाल ही में हुई बारिश ने गाँव की कच्ची सड़क को एक खौफनाक दलदल में बदल दिया था। इस रास्ते पर एम्बुलेंस या शव वाहन का आना तो दूर, नंगे पैर चलना भी मौत को दावत देने जैसा था। मजबूरन, रोते-बिलखते ग्रामीणों ने शव को अपने कंधों पर उठाया और घुटनों तक गहरे कीचड़, मलबे और दलदल को चीरते हुए 1 किलोमीटर का सफर पैदल तय किया। बेबसी की हद तो तब हो गई जब अंतिम संस्कार स्थल तक पहुँचने के लिए इन ग्रामीणों को उफनती हुई बोराई नदी के मटमैले पानी के बीच से गुजरना पड़ा। एक तरफ अपनों को खोने का गम और दूसरी तरफ जान जोखिम में डालकर अंतिम संस्कार की मजबूरी… आजादी के अमृतकाल में यह तस्वीर देश के सिस्टम पर एक करारा तमाचा है।
कागजों में दफन विकास, सालों का इंतजार
ग्रामीणों का दर्द है कि वे सालों से रेलवे बोराई नदी तक सिर्फ 1 किलोमीटर की सड़क बनाने की गुहार लगा रहे हैं। ग्राम पंचायत ने मनरेगा के तहत इस सड़क का प्रस्ताव भी पास करके भेजा, लेकिन साहबों की फाइलें दफ्तरों की धूल फांक रही हैं। योजनाएं कागजों से बाहर नहीं आ पाईं और नतीजा आज सबके सामने है। हर साल बरसात आते ही इस गाँव का संपर्क कट जाता है और ग्रामीणों को इसी अमानवीय स्थिति से गुजरना पड़ता है।
इस हृदयविदारक घटना के बाद सोंठी गाँव के लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। स्थानीय प्रशासन, जिला पंचायत और जनपद पंचायत के खिलाफ ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि क्या टैक्स देने और वोट देने के बाद भी उन्हें एक अदद सड़क के लिए तरसना पड़ेगा?
क्या इस देश में अब सम्मान से मरना भी नसीब नहीं होगा?
ग्रामीणों ने साफ लहजे में चेतावनी दी है कि अगर प्रशासन ने अब भी सुध नहीं ली, तो वे उग्र आंदोलन को बाध्य होंगे।




