छत्तीसगढ़जांजगीर-चांपा

आधुनिक दौर में भी जिंदा है हल-बैल की परंपरा, कटघरी के किसान दे रहे टिकाऊ खेती का संदेश

आधुनिक दौर में जहां खेती पूरी तरह ट्रैक्टर और मशीनों पर निर्भर होती जा रही है, वहीं जांजगीर-चांपा जिले के कटघरी गांव के कुछ किसान आज भी हल और बैलों से खेती कर पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। किसानों का मानना है कि बैलों से की गई जुताई मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के साथ बेहतर और टिकाऊ खेती में भी सहायक होती है। देखिए हमारी यह विशेष रिपोर्ट।


एक समय था जब गांवों में खेती पूरी तरह हल-बैल के सहारे होती थी। खेतों की जुताई से लेकर फसल की ढुलाई तक बैलगाड़ियों का उपयोग किया जाता था। बढ़ई हल, बक्खर और बैलगाड़ी तैयार करते थे और बदले में किसानों से अनाज प्राप्त करते थे। लेकिन समय के साथ ट्रैक्टरों और आधुनिक मशीनों ने इस पारंपरिक व्यवस्था की जगह ले ली।

जांजगीर-चांपा जिले के कटघरी गांव के किसान परसराम और कंसराम आज भी पारंपरिक तरीके से हल-बैल के माध्यम से खेती कर रहे हैं। उनका कहना है कि मशीनों से खेती की रफ्तार तो बढ़ी है, लेकिन मिट्टी की गुणवत्ता पर इसका असर पड़ा है। वहीं डीजल, खाद, बीज और कीटनाशकों की बढ़ती लागत ने खेती को और महंगा बना दिया है। ऐसे में पारंपरिक खेती आज भी उनके लिए लाभकारी साबित हो रही है।


बाइट –
परसराम / कंसराम, किसान

कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. के. डी. महंत का कहना है कि हल-बैल से जुताई करने पर मिट्टी की प्राकृतिक संरचना बनी रहती है। इससे मिट्टी में मौजूद उपयोगी जीवाणु सुरक्षित रहते हैं, बीज का अंकुरण बेहतर होता है और फसल की गुणवत्ता में भी सुधार देखने को मिलता है।


बाइट –
डॉ. के. डी. महंत, वरिष्ठ वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक खेती के तरीकों का संतुलित उपयोग ही भविष्य की टिकाऊ कृषि का आधार बन सकता है। इससे खेती की लागत कम करने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में भी मदद मिलेगी।

कटघरी गांव के किसान यह संदेश दे रहे हैं कि बदलते दौर में भी पारंपरिक खेती की उपयोगिता खत्म नहीं हुई है। यदि वैज्ञानिक सोच के साथ हल-बैल आधारित खेती को बढ़ावा दिया जाए, तो यह किसानों के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी एक बेहतर विकल्प साबित हो सकती है।

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