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जांजगीर-चांपा में बचपन पर श्रम का साया, विश्व बाल श्रम निषेध दिवस पर बड़ा सवाल

लोकेशन: जांजगीर-चांपा | छत्तीसगढ़ / रिपोर्टर: शुभाशु मिश्र

आज 12 जून, विश्व बाल श्रम निषेध दिवस है। एक ओर सरकारें बच्चों को शिक्षा, पोषण और सुरक्षित भविष्य देने के दावे कर रही हैं, तो दूसरी ओर जांजगीर-चांपा जिले के कई क्षेत्रों में आज भी बच्चों के हाथों में किताबों की जगह मजदूरी का बोझ दिखाई देता है। यह दिन हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर बच्चों का बचपन कब तक गरीबी और मजबूरियों की भेंट चढ़ता रहेगा।


जांजगीर-चांपा जिले के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में समय-समय पर होटल, ढाबों, चाय दुकानों, गैराज, ईंट-भट्ठों, कृषि कार्यों और छोटे व्यवसायों में बच्चों से काम लिए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। आर्थिक तंगी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते कई बच्चे स्कूल छोड़कर मजदूरी करने को मजबूर हो जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बाल श्रम केवल कानून का उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह बच्चों के शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षित जीवन के अधिकार का भी हनन है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार दुनिया भर में करोड़ों बच्चे आज भी बाल श्रम में संलग्न हैं, जिनमें बड़ी संख्या खतरनाक परिस्थितियों में काम करने को मजबूर है।
भारत में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से मजदूरी कराना कानूनन प्रतिबंधित है। इसके बावजूद कई स्थानों पर नियमों की अनदेखी की जाती है। प्रशासन समय-समय पर कार्रवाई करता है, लेकिन जागरूकता की कमी और सामाजिक परिस्थितियों के कारण समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बाल श्रम को रोकने के लिए स्कूल छोड़ चुके बच्चों की पहचान कर उन्हें पुनः शिक्षा से जोड़ना होगा। साथ ही ढाबों, दुकानों और औद्योगिक क्षेत्रों में नियमित निरीक्षण, गरीब परिवारों को रोजगार और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ना, ग्राम पंचायतों और शहरी निकायों की सक्रिय भागीदारी तथा बाल संरक्षण समितियों को मजबूत बनाना जरूरी है।
विश्व बाल श्रम निषेध दिवस केवल एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने का अवसर है। जांजगीर-चांपा जैसे विकासशील जिले में यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी बच्चा मजदूरी करने के लिए मजबूर न हो। क्योंकि जिन हाथों में आज औजार हैं, उन्हीं हाथों में कल देश का भविष्य भी है।
पीटीसी / समापन –
बचपन सीखने, खेलने और सपने देखने का समय होता है, न कि मेहनत-मजदूरी का। यदि समाज, प्रशासन और परिवार मिलकर प्रयास करें, तो हर बच्चे को उसका अधिकार और बेहतर भविष्य मिल सकता है।
“बच्चों का स्थान स्कूल में है, मजदूरी के अड्डों में नहीं। बचपन सुरक्षित होगा, तभी भविष्य मजबूत होगा।”

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